हर तरफ़ आहो-फ़ुग़ाँ जीवन सफ़र में।।

हर तरफ़ आहो-फ़ुग़ाँ जीवन सफ़र में।।
आँसुओं का कारवाँ जीवन सफ़र में।।

तोड़ कर अब झूठ का हर आइना तू
ख़ुद बना अपने निशाँ जीवन सफ़र में।।

आँधियों का ख़ौफ़ छोड़ो और उठ कर
तुम बना लो इक मकाँ जीवन सफ़र में।।

ये ख़िज़ाँ की गर्द, गुल की बेरुख़ी भी
है चमन का इम्तिहाँ जीवन सफ़र में।।

बन्दगी में ख़ुद को जो मसरूफ़ कर दे
पाएगा दोनों जहाँ जीवन सफ़र में ।।

क़ाहिली मंज़िल तलक जाने न देगी,
इल्म की पर हो कमाँ जीवन सफ़र में।।

तुम कभी दुश्वारी में हिम्मत न छोड़ो
बढ़ के छू लो आसमाँ जीवन सफ़र में।।

आज क्यूँ पत्थर के जैसा दिल हुआ है
इश्क़ की हो हर ज़बाँ जीवन सफ़र में।।

ये तलातुम लाख सर अपना उठा ले
कश्तियाँ होंगी रवाँ जीवन सफ़र में ।।

अंशु विनोद गुप्ता

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