तेरे सीने से लग
रोने का दिल चाहता है
हो जाए बर्बाद
समा जाना फिर चाहता है

मन बोझिल है
न जाने कहाँ उत्सर्ग किया
रोया किसके लिए
किससे प्रणय निर्वेद किया

जोड़ा दिल शब्दों से
पर टूट गया काँच सा चटक
आवाज जो आई थी
प्रिय के दिल से निकल कर

समेटा हाथ में जब
कस के खूब रोयी मैं भी
बिखख – बिलख कर
आँसू निकल आये बरबस

आज भी मेरे कण्ठ का
बना हार है वो आँसू बहुमूल्य
जो बिन -बिन आँसू
मोती से माला जैसे पड़े है

सुबह से शाम तलक
शाम से रात तलक न जाने
कितनी बार चूमा करती
इन आँसूओ को बार – बार

पर अपने को मिटाने में
प्रिय तुझमें डूब जाने में ही
महसूस की है गहराई
वो प्यार की असीम अथाह

वही कसक वहीँ व्यथा
हर क्षण ,हर कल्प मिलती रहें
दर्द गर मिले तुझसे तो
समझ अमृत सदा मैं पी लूँगी

डॉ मधु त्रिवेदी

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