है आतुर प्रियतम , सावन बन के  बरसने को
जागे अरमाँ उसके , चाहत पे फिसलने को

हर श्रावण सूना है,  जब पास न तू होता
यह नैन बसी नरमी , आकुल है सिमटने को

मैं दग्ध विरह में बैठी हूँ , कब आये पिय
जब  लौट रहा तू  , मैं  तैयार सँवरने को

क्यों फैल रही लाली , रक्तिम इन होंठों पर
कौमार्य हुआ व्याकुल ,  रोज उजड़ने को

हर साँस समायी तुझमें , जीवन देने को
दिलदार हुआ है तेरा , रोज बिछड़ने को

तू बात बना ऐसे क्यों , आज लुभाता है
जज्बात सुलगते है , तेरे पे बहकने को

अब मीत गले लग जा , बदरा बन बरसो तुम
मेरी मन की बगिया ,  बैचेन  रही मिटने को

भीगा तन -मन मेरा जब , बरस पडा सावन
हर रोम हुआ पुलकित ,  बैचेन किलकने को

डॉ मधु त्रिवेदी

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