यात्रा

यात्रा सभी करते हैं
कोई सोद्देश्य तो कोई निरुद्देश्य

कुछ लोग राहों में काँटे बिछाते हैं
तो कुछ लोग राहों से काँटे हटाते हैं
कि किसी के पाँवों में न चुभ जाए।

यात्रा में कहीं समतल
तो कहीं ऊबड़-खाबड़ होता है
कहीं पत्थर तो कहीं चट्टान मिलती है
कहीं झरने तो कहीं नाले
कहीं चिलचिलाती धूप
कहीं छायादार वृक्ष भी मिलते हैं

किंतु जीवन की यह यात्रा
आजीवन चलती है
जो बाधाओं में टूट गया
मानो वह जीवन रूठ गया
थक-हारकर जो बैठ गया
वह कहाँ गहरे पैठ गया!

नर-जीवन तो अनमोल है
स्व उदर-पूर्ति ही काम नहीं
कीड़े-मकोड़े की भाँति यह
जन्म-मरण का धाम नहीं

है बड़ा उद्देश्य इस जीवन का
है प्रकृति-रक्षा धर्म-कर्म हमारा

हम सदा सुपथ पर बढ़ते जाएँ
लक्ष्य-शिखर पर चढ़ते जाएँ
किंतु अन्य पथिकों के हित
पथ प्रशस्त भी करते जाएँ
स्व-सत्कर्मों के आलोक से
सुपथ आलोकित होता जाए
अंतिम श्वास तक की यात्रा में
पल-पल सर्वहित ही कामना हो
कभी नहीं विचलित होना
निश्छल-निर्मल नित भावना हो

तभी मिलेगा स्वर्गिक सुख
मुस्कान भरा होगा नित मुख
जीवन में सबकुछ भाएगा
मन परमानंद को पाएगा
जीवन-यात्रा का सार यही
न हो मन पर कभी भार कहीं
सर्वत्र प्रेम के धागे से हम
फटे रिश्ते को मढ़ते जाएँ

सत्यता ईमान सद्गुणों से
हम नव इतिहास गढ़ते जाएँ!

डॉ. किरण बाला

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