पता नहीं क्यू कब कैसे
गलतफहमी हुई तुम्हें ऐसे
पल भर में बदल दी तुमने इबारत
तोडकर लम्बी मित्रता की शहादत

शायद
भूल हुई तुमसे
या फिर यह खता हुई मुझसे
पल भर में तुमने यह कडी
तोडी मित्रता की यह जडी

शायद
ऐसा किया जानबूझ कर तुमने
प्रश्न बद्ध किया मुझे तुमने
वर्षों से विकसित किया मैने
मित्रता के इस वट वृक्ष को

शायद
कितना सींचा खाद पानी देकर
तुमने भी बडा किया धूप देकर
आज हुए निष्ठुर ऐसे
कयामत आयी हो जैसे

शायद
रास ना आया वो अंदाज तुमको
बनाया गया जो मजबूत नींव पर
बस झटके से गिराना था तुमको
झूठा आरोप लगाकर मुझको

शायद
आत्मा में पैठी कोई कचोट तुमको
झकझोर लगी कोई फिर तुमको
मगर मैं ना थी जरा भी कसूरवार
इसलिये दुआ देतीं हूँ हमेशा तुमको

शायद
खुश रहने की हमेशा हमेशा के लिए
विश्वास है तुममें एक लौं जलती है
मेरे स्नेह की प्यार की उसबंधन की
जिसे आज तुमने तोडा हमेशा के लिए

डॉ मधु त्रिवेदी

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One Comment

  1. रचना अच्छी हैः
    शायद देर से समझ आती है हमें,,।

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