जीवन यात्रा

गुस्से में घर से तो निकल आयी लेकिन जल्द बाज़ी में अपना पसंदीदा लॉकेट तो वहीं छोड़ आई। यूँ तो निशा को ट्रेन में यात्रा करना कुछ खास पसंद नहीं था पर जब भी अनुराग से झगड़ा कर घर छोड़ निकलती तो यही ट्रेन उसकी सहचरी बन जाया करती और एक आशा भी देती कि अनुराग अगले स्टेशन पर जल्द पहुंच कर मना कर घर वापस ले जाएंगे।
पर इस बार झगड़ा उसकी सूनी कोख पर जा रुका, जिससे निशा बेहद आहत थी। उसने फैसला कर लिया इस बार वो मम्मी पापा के घर से अनुराग के पास आयेगी ही नहीं, भले वो कितनी भी माफी क्यों न माँगे।
यही सोच रही थी कि तभी ट्रैन की खिड़की से बाहर नज़र पटरियों पर गयी और भाभी मां की वो बात यकायक याद आ गयी, जो उन्होंने उसे पगफेरे पर समझाई थी।
” निशा मैं तरी माँ जैसी हूँ… जानती हूँ तुझे गुस्सा जल्दी आता है पर जल्द से जाता नहीं। अनुराग बाबू बहुत सुलझे हुए हैं…वो तुझे खुश रखेंगे देख लीजो। बस कभी जो नोकझोंक हो तो गुस्सा न करियो, हमारा जीवन एक यात्रा है निशा, और पति पत्नी दो पटरियों की तरह इस गृहस्थी की रेल को मंज़िल तक पहुंचाते हैं”
” बेटी… थोड़ा खिसकना…थोड़ा टिक जाऊँ, बड़ी देर से खड़ी हूँ, थक गई”, एक बूढ़ी काकी की आवाज़ ने निशा को उस याद से बाहर निकाला।
बूढ़ी काकी और काका थोड़ी दूर तक ही जा रहे थे, बातों में पता चला कि उनका बेटा सरकारी नौकर है, जिसकी ऊपरी कोई कमाई नहीं। बहू भी नौकरी करती है तो घर का काम बूढ़ी हड्डियों के जिम्मे और दो साल के नटखट को संभलना भी। उसी के चलते आज पोते को चोट लग गयी तो बहू ने बहुत सुना दिया, दिल इतना दुखा कि आत्मसम्मान की रक्षा करने को घर छोड़ दिया।
लगता है आज सब ऐसे ही घर छोड़े हुए लोग सफर कर रहे हैं इस ट्रेन में, सोच कर निशा मुस्कुरा दी।
” लल्ली तुम्हारे कितने बालक हैं?”, काकी ने पूछा
” जी…अभी कोई नहीं”,?
” हमने तो सोचा था कि हमारा बेटा हमारी अंतिम यात्रा तक हमें साथ रखेगा, उसी को अपनी मंज़िल बना अभी तक कि यात्रा कर ली। अब तो…”, काका ने दुखी होते हुए कहा।
निशा फिर ट्रेन की खिड़की के बाहर देख रही थी और अगले स्टेशन पर उतर गई, यही सोच रही थी कि कभी कभी मंज़िल शायद उतनी ज़रूरी नहीं जितनी ज़रूरी यात्रा।

स्वपनिल वैश्य ‘स्वप्न’

No votes yet.
Please wait...

Leave a Reply

Close Menu