भुवनेश्वर यात्रा

यात्राएँ हमेशा ही हमें एक नया अनुभव देती हैं। हम अपनी दुनिया से इतर एक अलग संसार देख पाते हैं और अलग-अलग व्यक्तियों के विचारों से रूबरू होते हैं और बहुत कुछ सीख पाते हैं। ऐसा ही एक अनुभव आपके साथ कहानी के माध्यम से साँझा करना चाहती हूँ। तो सुनिये-
कमलेश और विनय शादी के बाद सीधे झाँसी पहुँचे क्योंकि वहाँ पर वह एक प्राइवेट कंपनी में कार्यरत था और कमलेश ने अभी नौकरी ज्आइन नहीं करी थी।
“कमलेश चलो सामान लगाओ अगले हफ़्ते भुवनेश्वर जाना है काम से। तुम भी साथ चल रही हो मेरे!” विनय शाम को ऑफ़िस से घर आकर बोलते हैं
“हाँ ज़रूर चलूँगी पर! आप तो काम पर चले जायेंगे मैं अकेले बोर हो जाऊँगी पूरे दिन!” कमलेश चिंता के साथ कहती है!
“अरे एक दिन का ही तो काम है वहाँ पर फिर शनिवार, इतवार में उड़ीसा और विशाखापट्टनम चलेंगें। वहाँ से ज़्यादा दूर नहीं रह जाता है। चलो सामान लगाओ ज़्यादा सोचो मत!” विनय प्यार से कमलेश की तरफ़ देखता हुआ कहता है
“हाँ फिर तो ठीक है! जगन्नाथ पुरी भी चलेंगें इस बहाने दर्शन भी हो जायेंगें। बीच भी तो है वहाँ पर बहुत मज़ा आयेगा अहा!” कमलेश ख़ुश हो जाती है
कमलेश की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था बड़ी ख़ुशी-खुशी यात्रा की तैयारी में जुट जाती है। चार दिन की यात्रा जो ठहरी कपड़े भी जगह के हिसाब से लगाने थे। शादी के बाद पहली बार वो अकेले सामान लगा रही थी। तो विनय की मदद लेनी स्वाभाविक थी।
आखिर वह दिन आ ही गया और दोनों ब्रहस्पतिवार की शाम रेल के डिब्बे में बैठ गये। नीचे की सीट थी दोनों की। साथ में एक परिवार और जा रहा था वो वहीं का था। बातचीत के साथ कैसे समय निकल गया पता ही नहीं चला? भुवनेश्वर में दिन बिताने के बाद वहाँ से उनको पुरी के लिये जाना था।
काम ख़त्म करने के बाद शाम को ही वे दोनों पुरी की गाड़ी में बैठ गये और वहाँ पहुँच गये। वहाँ उन्होंने एक गेस्टरूम बुक करा दिया और अपना सामान वहाँ रखकर नहा-धोकर दर्शन के लिये निकल गये। रात में चार बड़े की गाड़ी थी जो विशाखापट्टनम के लिये जानी थी।
अलार्म भी लगाया पर पता नहीं कैसे बज़ा ही नहीं। किसी ने दरवाजा खटखटाया “सर आपकी गाड़ी खड़ी है बस कुछ ही मिनट में चल पड़ेगी जल्दी भागो!”
इतना सुनना था कि दोनों के होश फाक्ता हो गये और जैसे-तैसे अपना सामान लेकर भागे। दरवाज़े के पास पहुँचते ही रेल चल पड़ी अब सामान अंदर फेंका गया और कमलेश को चलती गाड़ी से ऊपर चढ़ा दिया। लोगों ने अंदर खींच लिया फिर ख़ुद भी चढ़ गया। अंदर पहुँचकर साँस में साँस आई दोनों के लेकिन कमलेश लगातार रो रही थी और कह रही थी “मेरी वैली जो मुझे बहुत प्यारी थी चढ़ते हुए पैर में से प्लेटफ़ार्म पर निकल गई अब मैं आगे कैसे जाऊँगी? विनय ने समझाया अगला स्टेशन आयेगा तो हम नई ले लेंगें। तब कहीं जाकर वह चुप हुई।
अब अगला स्टेशन भी आ गया वह दौड़कर बाहर गया। अरे यह क्या? रेल तो चल पड़ी वह आया ही नहीं! वह पहली बार रेल में सफ़र कर रही थी तो इसके बारे में ज़्यादा जानती भी नहीं थी। सबने कहा चेन खींच दो तो उसने चेन खींच दी। टी टी उसके पास आये और चेन खींचने का कारण पूछा? उसने आप बीती बताई। उन्होंने साँत्वना देते हुए कहा कि आप परेशान ना हों रेल का हर डिब्बा अंदर से मिला हुआ है वह किसी ना किसी में अवश्य चढ़ जायेंगें। अगर विशाखापट्नम पहुँचने पर भी नहीं आये तो वहाँ पर अनाउंसमैंट करा देंगें। तब उसकी साँस में साँस आई।
अपना सारा सामान गोदी में लेकर बैठ गई अंदर से तो डर रही थी परंतु बाहर से किसी को ज़ाहिर ना होने दे रही थी। इतने में विनय को दोनों हाथ में पकौड़ी लाते हुए देखती है और सारा सामान छोड़कर भागकर उससे लिपट जाती है। ख़ूब रोती है अब मुझे अकेले छोड़कर कभी मत जाना!

अगले स्टेशन पर एक आदमी की आवाज़ कानों में सुनाई देती है। “चप्पल ले लो, चप्पल ले लो।”
“अरे भइया ज़रा दिखाना अच्छी सी चप्पल हमारे पैरों के लिये” कहकर एक जोड़ी सुंदर सी निकालकर पैरों में पहन लेती है।
वह दोनों कहते हैं कि यह यात्रा हमें पूरी ज़िंदगी याद रहेगी।

नूतन गर्ग

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