ये ध्वज यूँ ही लहरायेगा

तिरंगा तेरा कद बड़ा

चंद पंक्तियों में कहाँ समायेगा

कितना भी बखान करूँ

कुछ न कुछ रह जायेगा

हर दिल में रहता तू

न केवल ऊँची मीनारें ठाँव तेरा

ऐसा कोई नही,जिसे इश्क न हो

हर गली,शहर,हर गाँव तेरा

गर्व से कहे,यहाँ हर कोई

शान तेरी निराली है

जात,धरम न जानूँ मैं

मेरी ईद भी तू,तू ही दीवाली है

नजर काफिरों की हो लाख बुरी

तुझपे आंच न आने देंगे

वीरभूमि में जन्म लिया

अवसर मिला तो जां भी देंगे

मस्त पवन की ताल पर

वीरों की गाथा गायेगा

जब तलक रहेगा सूर्य गगन में

ये ध्वज यूँ ही लहरायेगा

©प्रशांत ‘निर्मोही’

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