हिन्दी लेखक डॉट कॉम की आवश्यकता

हिन्दी लेखक डॉट कॉम की आवश्यकता

By |2018-02-10T23:50:12+00:00August 15th, 2016|Categories: सम्पादकीय|9 Comments

आपका महत्पूर्ण 2 मिनट चाहता हूँ … आभार

नमस्कार, सभी आम लोगों की तरह मुझे भी अपने देश की बड़ाई सुनने का बड़ा ही शौक रहा है | भारतीय इतिहास के पन्नों से भारत की बौद्धिक / आर्थिक समृद्धता को पढ़ कर सुनकर फुले न समाता हूँ | परन्तु आज के वैश्विक पटल पर भारत और भारतवासियों की स्थिति देखकर मन उदासी के सिवा और कुछ नहीं पाता है | बचपन से ही भारत की पुनरुत्थान के लिए कपोल कल्पनाएँ करता रहा हूँ, यक़ीनन आप भी करते हैं |

परन्तु ज्यों ज्यों उम्र बढ़ती गई, कल्पना में खीचे गए खाकों ( भारतीय पुनरुत्थान के लिए ) में सुधार की  जरुरत पड़ती गई | कल्पना के आधार पर कुछ दिनों , महीनों में भारत को विश्व मंच पर श्रेष्ठता दिलाने का सपना वास्तव में, सपना ही महसूस होने लगा | कारण था लोगों के बीच की दुरिया, कुछ वास्तविक और कुछ काल्पनिक , कुछ प्रत्यक्ष और कुछ परोक्ष | मैं उन दूरियों को मिटाने के लिए हर वक़्त विचार करने लगा, लेकिन कभी कुछ ठोस सुझा नहीं | अपने ही विचार, दुसरे विचारों से विरोधाभासी प्रतीत होने लगे| फिर एक उम्र का वह पड़ाव आया जहाँ व्यक्तिगत विकास में उलझ गया, और बचपन का सपना छूटने लगा, टूटने लगा |

हिन्दी ( मातृभाषा ) की वर्तमान स्थिति – 

एक छोटी सी कहानी जो मेरी भाषा के प्रति सोच को बदलने में अगुआई की | बात बहुत पुरानी नहीं लेकिन पुरानी है, मैं एक promotional agency में मुख्य डिज़ाइनर की हैसियत से कार्यरत था | उत्तर प्रदेश में HPCL के लिए एक प्रमोशन का अभियान चल रहा था | मेरी जिम्मेदारी थी सारे प्रट्रोल पम्प पर लगने वाले होर्डिंग का डिज़ाइन बनवाना और निरीक्षण करना | इसी निरीक्षण प्रक्रिया में हम पहुचें उत्तर प्रदेश के कई शहरों और गाँवों में स्थित प्रट्रोल पंप पर | हमें हर पेट्रोल पम्प का एक फोटो लेना होता था | चौथा दिन था, मैं मानसिक और शारीरिक तौर पर काफी थक चूका था, हमारी एक गाडी ( बड़ी कार ) ख़राब हो गई थी | हमलोग ( ४ व्यक्ति ) एक छोटी सी कार में थे, मैंने आलस में सलाह दिया कि कार का शीशा नीचे करके फोटो खीच लो, उतर के जाने की जरुरत नहीं है | एटा जिले के एक छोटा शहर के पेट्रोल पम्प पर ऐसा ही किया गया और आगे बढ़ गए | १०० मीटर भी नहीं चले होंगे, तभी दो मोटरसाइकिल वाले आकर हमें रोक लिया |

– साहब ! बुला रहे हैं…

– क्यों क्या हो गया|

– जितना बोलता हूँ सुन, चुपचाप चल साहब बुला रहे हैं …

मेरे एक सहकर्मी ने बोला – मैं आता हूँ सर मिलकर | आप बैठिए …

कुछ देर बाद मेरे दुसरे सहकर्मी गए, समझाने | लेकिन निष्कर्ष नाकारत्मक था | मैं मन ही खुद के बेवकूफी पर खीझने लगा, थोड़ा सा आलस से बचता तो इसमें न उलझता | तभी हमारा एक सहकर्मी लौट कर आया और बोला, आपको बुला रहे हैं …

मैंने पहुँचकर देखा … वहाँ 3~4 लोग बैठें हैं और मेरे सहयोगियों की मजाक उड़ा रहे हैं …

मैं भी काफ़ी घबरा रहा था, फिर भी परिस्थिति को संभालना तो था ही मैंने बोला …

Hello Sir, We are running promotional campaign behalf of HPCL. We are from a promotional agency based in Noida. Personaly I am extremely sorry, without any information we took photographs of your petrol pump.

इतने में एक आदमी बोला, कोई कार्ड है आपके पास …

जी, मैंने एक सहयोगी को बोला जाकर कार में से ले आए |

बीच में ही दखल देते हुए एक दुसरे आदमी ने बोला … रहने दीजिये सर, कार्ड की जरुरत नहीं … कुछ चाय – पानी लेंगे सर |

मैं ना में सर हिलाया | मैं समझ नहीं पा रहा था, जो बातें मेरे सहयोगी पिछले 20 मिनट से समझा नहीं पा रहे थे, मेरे कहने से वो 1 मिनट में कैसे समझ गए | मैंने अपने सहयोगियों से पूछा | फिर जो जानकारी मिली मैं आश्चर्य में था, खुश भी था, और साथ ही साथ क्षुब्ध भी था |

जवाब था, अंग्रेजी के चंद वाक्य…

जो मेरे सहयोगी ने उन आदमी को आपस में बात करते सुना था और उसका भी यही मानना था …

अंग्रेजी जानना मतलब, आप पढ़े लिखे हैं | आप अच्छे घर से हैं | और शायद संस्कारी भी कहे जा सकते हैं |

मैं खुश था, मुझे अंग्रेजी का थोडा ज्ञान एक मुश्किल से निकल लाया था |

लेकिन नाखुश था, एक विदेशी भाषा के आधार पर हमारे अपने देश में एक गलत सन्देश पहुंचा है| मैं इस विषय में गहराई में जाने का कोशिश किया तो मालूम चला | सिर्फ अंग्रेजी जानने वाले को पढ़ा लिखा मानने तक ही सीमित नहीं, बल्कि अंग्रेजी भाषा के ज्ञान न होने के करण बहुत लोगों में हीन भावना भी आ गई है | इस भाषा के प्रचार प्रसार के लिए लाखों छोटे बड़े शिक्षा केंद्र चल रहे हैं | फिर भी इन कई दशकों के प्रयास में न तो सारे भारतीय अंग्रेजी सीख पायें हैं | न ही लोगों के मन में अंग्रेजी के प्रति व्यव्हार बदला है |कोई अंग्रेजी जान कर खुद को श्रेष्ठ समझ रहा है तो कोई खुद को अंगेजी ज्ञान के बिना हीनता से देख रहा है | अंग्रेजी शब्दों के गलत उच्चारण के लिए, लोगों को मजाक बनाना मैंने खुद कई बार देखा है |

इस विषय में मुझे कामिल बुल्के जी की पंक्ति याद आती है …

“When I arrived in India in 1935, I was surprised and pained when I realized that many educated people were unaware of their cultural traditions and considered it a matter of pride to speak in English. I resolved my duty would be to master the language of the people.”

हिन्दी एक विकल्प 

मेरे मन में, बस एक ही विचार आता रहा | लोगों को इससे बाहर निकलने के लिए एक विकल्प की बड़ी ही सख्त आवश्यकता है | कहीं न कहीं मुझे अंग्रेजी के प्रति गुस्सा भर गया था | मैंने एक वेबसाइट की रचना कर डाली ” अंग्रेजी भारत छोडो .कॉम ” कुछ दिन तक उसे चलाया | Orkut और facebook पर पेज बनाएँ, प्रचार – प्रसार की कोशिश की | लेकिन कुछ ठोस प्रतीत नहीं हो रहा था | ऐसा महसूस हो रहा था जैसे  मेरे कहने में कुछ कमी है या गलत है | जैसे किसी रास्ते पर लिखा हो, दाईं ओर न देखें …और सब दाईं ओर देखे बिना रुक नहीं पाते |

कई बार जब तथाकथित पढ़े – लिखें लोगों से साथ बैठता हूँ तो लगता है | भारत की प्रगति के लिए अंग्रेजी का ज्ञान होना आवश्यक है | लेकिन जब मैं उन लोगों से मिलता हूँ, जिन्हें अंग्रेजी का ज्ञान नहीं है| तब बस यही विचार आता है, अगर इन्हें उस स्तर की अंग्रेजी सिखाई जाये जिससे वो सम्मान उन्नति कर सकें औरों के साथ तो इसमें जाने कई और साल लगेंगे, शायद पीढियां लग जाएँ | अंग्रेजी सीखने सिखाने का सिलसिला आज का नहीं है | फिर तो बस यही लगता है, इनलोगों तक ज्ञान इनकी भाषा में ही पहुँचाना होगा| और ये सभी बुद्धिजीवियों को कर्त्वय्व है कि हम उनका सहारा बनें जो पीछे रह गए हैं | लेकिन कोई विदेशी भाषा थोप कर नहीं कर सकते | जो विदेशी भाषाएँ सीखना चाहते हैं, वो सीख लेंगे, लेकिन उनकी पढाई भाषा ज्ञान के कमी के कारण बाधित न हो |

बाद में शायद मुझे अंग्रेजी से गुस्सा नहीं रहा था, किसी भाषा से कैसा गुस्सा | मुझे तो एक ऐसे विकल्प के बारे में सोचना था, जो उनमें समानता की भावना दे, आपस में जोड़े, उनकी प्रारम्भिक व उच्च स्तरीय पढाई बाधित न हो और उन्हें गर्व भी हो | मातृभाषा ही एक ऐसा माध्यम दिखा जो लोगों को आज भी आपस में जोड़ती है | अगर कुछ किताबी ज्ञान को छोड़कर बातें करूँ तो लोग आज भी अपनी मातृभाषा में ही बात करते हैं, लेकिन तय करना था कौन सी भाषा क्योंकि भारत में बहुत सारी भाषाएँ और बोलियाँ हैं | फिर मैंने बहुत कुछ इन्टरनेट के जरिये, लोगों से बातें करके, किताबों से जाना तो पाया, भारत में सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा हिन्दी है | बॉलीवुड सिनेमा के करण हिन्दी की पहुँच विदेशों में भी है, आप कह सकते हैं हिन्दी भाषा का एक बहूत ही बड़ा समाज है| थोड़े से प्रयास से इसे एक नई मंजिल दी जा सकती है| हिन्दी भाषा की एक और खास बात कि इसमें कईं भाषाओँ के शब्दों का समावेश है| भारत की अधिकतर भाषाओं में शब्दों को मेल जोल रहा है, जिस कारण भारत के कई अहिन्दी भाषी भी हिन्दी के शब्दों से चिरपरिचित हैं |

हिन्दी लेखक डॉट कॉम की नींव

मातृभाषा में ज्ञान वितरण नहीं होने कारण, उच्चतर पढाई लिखाई कुछ वर्गों तक ही सीमित रह गई है | बहुराष्ट्रीय कम्पनी में काम करने के लिए अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है | और भी समाज में व्याप्त कई ऐसी अवांछित चीजों का करण आप देखेंगे कहीं न कहीं, मातृभाषा का उच्च स्तरीय प्रगति न होना है | अगर देश की स्थिति में सुधार लाना है तो मातृभाषा की गरिमा को समझना होगा |

भारतेंदु हरिश्चंद के शब्दों में ” निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल |”

किसी देश की उन्नति के लिए वहाँ के जन भाषा का उन्नत होना अतिआवश्यक ही नहीं अपितु आधार स्तम्भ है | उदारहण के तौर में दुनिया के कई छोटे-बड़े देश देखे जा सकते हैं … जापान ( जापानी ), जर्मनी ( जर्मन ), चीन ( मंडारियन ), फ़्रांस ( फ्रेंच )|

जिस तरह देश के उन्नति के लिए मातृभाषा महत्पूर्ण है, उसी तरह मेरा ध्यान भाषा की उन्नति के लिए भाषा के लेखकों में प्रति आकृष्ट हुआ | बस हिन्दी लेखक डॉट कॉम  की रचना हो गई | अकेला चला था, लेकिन लोग जुड़ रहे हैं | आपका साथ मुझे प्रगति पथ पर एक ठोस कदम की तरह महसूस होता है |  कुछ लोग टांग खीचने वाले भी मिलते रहेंगे, लेकिन उनका टांग खीचना एक अदम्य साहस देता है और यक़ीनन इशारा करता है आप सही रास्ते पर हैं |

मैं सभी देशवासियों और हिन्दी प्रेमिओं से आग्रह करता हूँ, भाषा की उन्नति में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लें | जो लिख सकते हैं लिखें |

पाठकों से विनम्र निवेदन है कि, लेखकों की रचनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया देकर उन्हें उत्साह प्रदान करें |

लोगों को हिन्दी लिखने, पढने व बोलने के लिए उत्साहित करें| बहुभाषी बनें, लेकिन मातृभाषा का सम्पूर्ण ज्ञान रखें |

हिन्दी लेखक डॉट कॉम से जुड़ें ( http://hindilekhak.com/ )

कहने को और भी बहुत कुछ है… लेकिन फिर कभी.

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9 Comments

  1. विकास सिंह February 21, 2017 at 11:11 pm

    #दिल_को_छू_गया_यार
    मुझे भी ऐसी कई घटनाओं का सामना करना पड़ा है। मैने निश्चय किया कि व्यक्तिगत जीवन में हिन्दी का प्रयोग करूंगा। आपके इस प्रयास के भाव को मेरा नमन। थोड़ा बहुत लिखता हूँ। प्रकाशनार्थ प्रेषित करूंगा। शेष संपादकीय व्यवस्था का विषय है। इति शुभम्

    Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
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  2. hindilekhak February 22, 2017 at 9:59 am

    आपका स्वागत है …

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  3. vikas dinkar March 17, 2017 at 1:51 am

    चरित्र में कुछ दाग होने भी जरूरी है … . .
    वर्ना बुढापे में गँगा में जाकर धोएँगे क्या ??
    कच्छे ???

    Rating: 3.5/5. From 4 votes. Show votes.
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  4. hindilekhak March 17, 2017 at 9:14 am

    अब गंगा में पाप नहीं धुलते …
    हमारे जैसों ने गंगा में पाप धो धो के गंगा मैली कर दी है …
    अब शुरुआत करने होंगे … पाप भी न हो और गंगा भी दूषित होने से बच सके …

    Rating: 5.0/5. From 2 votes. Show votes.
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  5. Sanjay Sharma July 13, 2017 at 2:03 pm

    बहुत सराहनीय प्रयास है आपका, हमें अपनी भाषा पर गर्व करना ही चाहिये। आपके इस प्रयास ने इतना मोहित किया है कि कुछ पंक्तियाँ बन पड़ी हैं, अत: भेज रहा हूँ, यदि आवश्यकता प्रतीत हो तो निश्शंकोच सम्पादकीय में प्रयोग कर सकते हैं –
    हम हैं हिन्दी के बेटे, सभी हम हिन्दुुस्तानी हैं
    अगर कोई हिन्दी को भूले, तो माँ से बेईमानी है ।
    हमें हिन्दी ने बोली दी, हम हिन्दी को बोली दें
    निखिल जग में बना सिरमौर हमें हिन्दी पुजानी है ।।
    © संजय कुमार शर्मा ‘प्रेम’

    Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
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  6. admin July 13, 2017 at 3:51 pm

    संजय जी, आपके शब्दों के लिए हार्दिक अभिनन्दन। आप जैसे सुधि जनों का साथ हिन्दी लेखक डॉट कॉम के उद्देश्य को दिशा एवं गति प्रदान करेगी।

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  7. prem kumar pal July 17, 2017 at 11:47 am

    बहुत सुन्दर प्रयास जी

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  8. Santosh Kumar Verma February 15, 2018 at 11:12 pm

    सर मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूं पर क्या कहा जा सकता है लड़ने वाले ठीक अपने स्तर पर लड़ रहे है, पर क्या कहा जा सकता है कि बेरोजगारी इतनी बढ़ गई है कि हर तरह से हिंदी को तुच्छ दृष्टि से देखा जा रहा है । जहां आप अंग्रेजी ठीक से नही बोल पाते, आपके लिए अच्छी नौकरी तक नही है। मै खुद इसका भुक्तभोगी हुं और बेरोजगारी की मार झेल रहा हूं। जहां जाता हूं हिंदी को कोई पुछता तक नही । हिंदुस्तान मे हिन्दी के बजाय अंग्रेजी जरूरी कर दी गई है तो भविष्य तो सही होने से रहा जब तक हिंदी को महत्व नही मिलती।

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  9. प्रवीण कुमार दिशावर April 5, 2018 at 6:37 am

    भाषा से प्रेम ही आपके जीवन का आधार है
    जो सीखी है भाषा माँ से हमें उससे प्यार है
    लोगों के समझने का तरीके अलग होते है प्यारे
    जो भाषा से लगाव रखे दुनिया में होते है न्यारे
    आओ सब मिलकर अपनी भाषा की दशा सवारें ।

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