हिन्दू को हिन्दू, नमाजी को मुसलमान रहने दो

हिन्दू को हिन्दू, नमाजी को मुसलमान रहने दो
ना मिटा मजहबे शह में, मुझे इन्सान रहने दो।
कभी कट गए थे, बेसबब, जिन्दा जले, जिन्दा दफन
हुए जो बेघर कभी ये छप्पर मकान रहने दो।
कौन जिएगा उम्र भर महताब के चमकने तक
सफर है चंद लम्हों का, मुझे मेहमान रहने दो।
ना उजाड़ो घर किसी का, मंदिर – मस्जिद के नाम पे,
किसी की मांग में सिंदूर, राखी में मान रहने दो।
भूल जा शिकवे-गिले वो अदावतें गुजरी हुई
दिल में चमकती दीवाली, होंठो पे रमजान रहने दो।
दर्द तो इक माॅं को होगा, हिन्दू मरे या मुसलमां
उस माॅं की सूखी हड्डियों में जरा सी जान रहने दो।
बच्चे इंतजार में हैं, अभी आएं क्यों नहीं वालिद
खुदा के वास्ते, उनके लबों पे मुस्कान रहने दो।
क्या हासिल हो जाएगा मन्दिर मस्जिद को तोड़ के
किसी के घर में गीता, हाथों में कुरान रहने दो।
माॅं तो फैला देती झोली, हर पत्थर के सामने
शंखध्वनि मंदिर में, मस्जिद में अजान रहने दो।
कभी भूख लाचारी, आंसूओं से, पूछा है मजहब उनका
किसी मजलूम के हाथों में, रोजी का सामान रहने दो।
हाॅं, हिन्दू को हिन्दू, नमाजी को मुसलमान रहने दो।।

– बिहारी लाल

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