गिरवी है कलम

सुनो,
मैं अब नहीं लिख सकता
तुम्हारे साथ हुए जुल्मों-सितम के बारे में
नहीं रख सकता अब हिसाब
तुम्हारे आँसुओं का
लो,
दिखना भी बंद हो गया है मुझे
वो लाल निशान
देख कर जिसको महसूस किया था मैंने
उधेड़ दी हो जैसे किसी ने मेरी पीठ ।
तुम्हारे जख्म अब सिर्फ तुम्हारे हैं
और उनके दर्द से अब
मेरा नहीं है कोई वास्ता
ना ही अब काम है मेरा
तुम्हारी सिसकियों को आवाज देना ।
मैंने गिरवी रख दी है आज अपनी कलम
उस महाजन के पास,
जिसके तुम गुलाम हो ।

–  अभिजीत

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