झुमकी की मौत

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झुमकी की मौत

By |2018-01-21T15:52:45+00:00September 4th, 2016|Categories: कहानी|Tags: |2 Comments

jhumki-ki-mautहासन झोपड़ी के बाहर बीड़ी पर बीड़ी फूंके जा रहा था कि उसे अचानक खांसी का धचका लगा और वह बुरी तरह खांसने लगा, खांसते – खांसते  बलगम के साथ रक्त का थक्का भी निकल आया।उसके खंखारने की आवाज सुन कर गुनिया झोपड़ी से बाहर आ गयी और बड़बड़ाने लगी’’ इहां दुई जून की रोटी नाही जुड़ात है अउर ई ससुर बीड़ी में पइसा अउर जिगरा दुइनो फूंके पड़ा है ‘‘।
फिर एक अल्मुनियम लोटे में पानी उसके हाथ में पटकते हुए बोली ’’ आये दो झुमकी का तोहर सारी करतूत बतइबे‘‘।
यह सुन कर हासन बिफर पड़ा ’’काहे झुमकी का को लारड गवरनर है कि हमका फंासी चढ़ाय देही,उई दुई बीता भर की छोकरी हमका उकर डर दिखाय रही है …हुंह‘‘।
’’ हां दुई बीता की है पर ओहकी कमाई से ही घर मां रोटी का जुगाड़ हुई जात है नाही तो पेट और पीठ एक हुई जात रहै‘‘।
हासन ने अकड़ कर कहा ’’ हां तौ हमरै बिटिया तौ है ,उ हमका तोहरे से जियादा माने है‘‘।
’’ अब जियादा भैाकाल न दिखावौ‘‘ कहते कहते गुनिया को याद आया कि चूल्हे पर सब्जी चढ़ी है कहीं जल गई तो नमक रोटी खानी पड़ेगी और वह अन्दर को लपकी।
भूख और गरीबी से त्रस्त हो कर हासन जब शहर आया था तो दो दिनो तक उसे और उसके परिवार को पानी पर दिन व्यतीत करने पड़े थे। धीरे धीेरे पूरे परिवार ने मजदूरी करके किसी तरह शहर में सांस लेने का जुगाड़ कर ही लिया था ।हासन ,गुनिया ,सबसे बड़ी औलाद चैदह साल की झुमकी ,बारह का राजू ,मजदूरी करते और ग्यारह साल की मुनिया छोटे भाई बहन बिट्टू, और माजी की देख भाल करती ।उसके गांव के रमई ने अपने बचपन की यारी निभाई ,उसी की सहायता से पांव जमाने का आसरा मिला और उसने झुपड़ पट्टी में एक झोपड़ी बना ली ।
हासन राणा साहब की कोठी पर मजदूरी के काम लगा था हासन के साथ झुमकी भी मजदूरी करने गई । राणा साहब की मैडम को उसका तन्मयता से बिना रूके काम करना भा गया ,उन्होने कहा ’’ मैं तुम्हारी बेटी को अपने पास रखूंगी वो हमारे घर के काम में सहायता करेगी और हम उसे पढ़ाएंगे ।‘‘

’पर हुजूर हमका छोरी केा पढ़ाय के का करे का है, मजूरी करके कछु पइसा ही कमाय लेत है।‘‘
’’अरे तो हम भी कोई मुफ्त में काम थोड़े ही कराएंगे पूरे हजार रूपये देंगे और तुम्हारी बेटी का खाना पहनना पढ़ना मुफ्त‘‘ मिसेज राणा ने कहा।
हासन को सौदा लाभ का लगा ,दोनो हाथ में लड्डू, एक हजार रूपये हाथ में और एक पेट का खाने का भार कम ।
झुमकी राणा जी के घर काम करने लगी कुछ ही दिनों में उसकी तो चाल ढाल ही बदल गई। उसकी भाषा बोली पहनने ओढ़ने का अंदाज सब बदल गया ।अब उसकी बोली में गांव की गंवई बोली का स्थान खड़ी बोली लेती जा रही थी। अच्छे खाने ने उसकी धूल में छिपी लुनाई को बरसात के बाद धुली पंखुड़ी सा निखार दिया था, जूं से भरे रूखे केशों की जगह शैम्पू किये करीने से पोनी टेल में बंधे बालों ने ले ली थीे । मैडम के रिजेक्ट किये कपड़ों में वह सड़क पर लगे पोस्टर की नायिका से स्वयं की तुलना करने लगी थी और कुछ रंगीन सपने देखने का साहस करने लगी थी। महीने में एक बार झुमकी घर आती तो उसे समझ न आता कि उस कच्चे घर की कच्ची जमीन पर कहां बैठे। जब वह बप्पा के हाथ में हजार रूपये रखती तो अनजाने ही उसके आगे अम्मा बप्पा का कद बौना हो जाता और छोटे भाई बहन हसरत से उसके कपड़े छू छू कर देखते।
सब कुछ ठीक था कि अचानक उस सुबह दस बजे किसी ने आ कर हासन से कहा ’’ तुम्हारी बिटिया ने फांसी लगा ली‘‘।
हासन और उसकी बीबी गुनिया हकबक रह गये,अभी पिछले हफ्ते ही तो झुमकी आई थी तब तो सब ठीक था।कुछ क्षण तो वो संज्ञा शून्य हो गये फिर जब बात समझ में आई तो वो जिस हाल में थे राणा जी के घर की ओर दौड़ पडे़। उनके कदम तो मानों साथ ही छोड़े दे रहे थे दोनो यही मना रहे थे कि झुमकी के ऊपर कौवा बैठा हो इसी लिये उसकी लम्बी उमर की खातिर उन्हे यह खबर दी गई हो।उनका बावरा मन यह नही सोच पाया कि ऐसा झुमकी का कौन हितैषी बैठा है जो उसकी लम्बी उमर की खातिर इतना बखेड़ा करेगा।
राणा जी के घर में जमीन पर उनकी बेटी सदा के लिये आंखे मंूदे पड़ी थी।हासन और गुनिया उसके षरीर से लिपट कर दहाड़े मार कर रो पड़े । वो मन भर रो भी न पाये थे कि विकासदेव उन्हे उठा कर अपने साथ बाहर ले आये।उन्होने उससे कहा ’’तुम पहले थाने चलो ,फिर राणा जी से निबटना।‘‘
हासन ने कहा ’’ थाने काहे अरे कोऊ बतावा है कि हमरी बिटीवा कछु कर लीहिस अउर आप हमही का थाने ले जाय रहे हो‘‘।
विकास देव ने कहा ’’ इसीलिये तो हम कह रहे हैं कि थाने चल कर रिपोर्ट लिखाओ‘‘।
बेटी को देखने को बेचैन गुनिया ने कहा ’’ साहब हमका अपनी बिटीवा मन भर देखै का है का पता अभी जान बची होय अउर उ जी जावै ,तुम हमका बीचै में न अटकाओ‘‘।
विकासदेव ने कहा ’’ तुम्हारी बिटिया तो अब दुनिया से जा चुकी है ‘‘। समाचार की दोबारा पुष्टि से हासन और गुनिया की रही सही आशा भी घ्वस्त हो गई।
दुखी हासन को विकासदेव की दुनियादारी की बाते इस समय शूल सा चुभ रही थीं उसने विरोध किया ’’ हमका कोरट कचहरी मां नाही परेका है साहिब‘‘।
’’अरे हद करते हो उन्होने तुम्हारी बेटी को मार दिया और तुम उन्हे ऐसे ही छोड़ दोगे, अपनी बेटी का बदला भी नही लोगे‘‘ विकासदेव ने उन्हे भड़काया।
’’पर साहिब मैडम जी तो ओका बहुत चाहे रहीं हमका तो यहु नाही पता कि हुआ का है हमका तो बस ओका देख्ैा का है‘‘हासन ने कहा।
’’तुम बहुत भोले हो अरे तुम्हारी बेटी मरी है वो भी मि0 राणा के घर पर ।‘‘
’’पर एक बार ओहसे पूछेै तो का हुआ ,सुना है वह खुदय मरि गई‘‘।फिर कुछ सोचता सा बोला ’’वैसे साहिब हमरी बिटीवौ कम गरम दिमाग की नाही रही ,का पता का हुआ। अउर साहिब ऊ बरे लोग उनकेर हमरी बिटिया से का दुसमनी अउर सौ बात की एक बात उनका सजा दिराय से हमरी बिटीवा तो हमका मिलिहै नाही‘‘।
’’ पर ई है कि अगर उनके बरे हमरी बिटीवा मरी है तौ हमरा सराप उनकेर छोहिड़है नाही ‘‘गुनिया ने कहा।
विकास देव ने सिर थाम लिया उन्हे लगा गुनिया को समझाया जा सकता है वो गुनिया से बोले ’’ये तो सिरफिरा है‘‘ उन्होने उसे सीधे सीधे समझाया ’’ देखो यह कोई छोटी बात नही है तुम्हारी बिटिया गई है वो भी राणा जी के घर में उसने आत्म हत्या की है, मुआवजा तो उनको देना ही होगा‘‘।
गुनिया को बात समझ में आ गई उसने हासन को घुड़का ’’ अरे झुमकी के बापू हमरी झुमकी का तो उई मार दिहैं ।उई तो गई पर चार पिरानी जो हैं उनका का होइहै अब हमरा खर्चा पानी कइसे चलिहै‘‘।
यह सुन कर हासन को होश आया और बेटी के विछोह में व्यथित पिता का गला घोंट कर दुनियादार इंसान जगा। उसने घटना का यह पक्ष तो सोचा ही नही था। अचानक ही उसे बीड़ी की तलब लगने लगी और उसे अपने ऊपर क्रोध आया कि उसे अब तक वह मूर्ख विकासदेव के कहने का अर्थ क्यों नही समझ रहा था। बेटी तो हाथ से गई ही उसे थेाड़ी देर बाद भी देखा जा सकता है पहले तो विकास देव के साथ थाने जाना होगा रिपोर्ट लिखाने ।
जिस समय झुमकी ने आत्महत्या की उस समय श्री राणा के घर में केवल उनकी पत्नी ही थीं ।यद्यपि उनके अनुसार वो तो अपने कमरें में टीवी देख रही थीं और उन्हे नही पता कि झुमकी ने ऐसा क्यों किया। पर ऐसा कहने से तो उन्हे निर्दोष नही माना जा सकता और फिर उनका और कोई दोष भले न हो नाबालिग लड़की को काम पर रखने का अपराध तो बनता ही था। वो भले ही कहती रहीं कि वो तो झुमकी के परिवार की सहायता के लिये उसे पढ़ाने के लिये ,उसकी जिंदगी सुधारने के लिये अपने पास रखे थीं और सच कुछ भी हो पर मीडिया और हवा में फैलेे चर्चों के गुबार और परिस्थितियां शक की सुई उन्ही की ओर मोड़ रहे थे।
जब मिसेज राणा को लाक अप से कोर्ट ले जाने के लिये ले जाया जाने लगा तो वहां जमा भीड़ एकाएक चैतन्य हो गई मानो उनके जीवन की सार्थकता उन्हे दंड दिलाने में ही है।सारे के सारे लोगों ने जीप को चारों ओर से घेर लिया।
’’पैसे वाले होश में आओ ,खूनी को सजा दो,गरीब भी इंसान है उसे भी इंसाफ चाहिये…………………..‘‘के नारे गूंजने लगे।कुछ लोग जीप पर डंडे मारने लगे, बड़ी कठिनता से पुलिस उग्र होती भीड़ को रोकने का असफल प्रयास कर रही थी अन्ततः विकास देव ने आ कर भीड़ को नियंत्रित किया।
तभी श्री राणा अपनी गाड़ी से वहां आये, भीड़ कुछ करती उससे पूर्व ही विकास देव ने भीड़ को शांत रहने का इशारा किया और श्री राणा की कार के पास पहुंचे। उन्होने श्री राणा की गाड़ी रोक कर उनसे बाहर आने का संकेत किया। श्री राणा को एक किनारे ले जा कर विकास देव ने कहा ’’अगर आप इस भीड़ के गुस्से से बचना चाहते हैं तो मैं यह काम कर सकता हूं ‘‘।
’’ आप बताइये मैं क्या करूं किसी तरह इस भीड़ को रोकिये,मै तो ऐसे ही बहुत परेशान हूं ऊपर से यह भीड़ और मुसीबत किये है।‘‘
’’देखिये उस गरीब की बेटी गई है और किसी भी इंसान के लिये चाहे वह गरीब हो या अमीर जान से जादा कुछ नही होता‘‘।
’’हंा मै मानता हूं पर इसमें मेरी पत्नी का कोई दोष नही है । वो तो उसका बहुत ध्यान रखती थी अब उसने जान दे दी तो मै क्या करूं‘‘श्री राणा ने पसीना पोछते हुए कहा।
’’देखिये साहब जिसकी बच्ची की जान गई है उसके लिये तो जो उसका रखवाला था वो ही दोषी होगा, कुछ भी हो आपके घर पर उसकी बेटी की जान गई है तो जिम्मेदारी तो आप की ही है‘‘विकासदेव ने उन्हे दबाव में लेते हुए कहा, फिर उनका उतरा चेहरा देख उन्हे समझ आ गया कि तीर निशाने  पर लगा है। वो उनके कंधे पर हाथ रखते हुए बोले ’’ वैसे देखिये मेरी सहानुभूति आपके साथ है।‘‘
श्री राणा को विकासदेव डूबते में तिनके का सहारा लगे, वह तुरंत विकासदेव का हाथ थाम कर बोले ’’ तो बताओ मैं तो कुछ भी करने को तैयार हूं ‘‘।
’’वैसे तो किसी के लिये भी उसका बच्चा अनमोल होता है और झुमकी तो अपने घर के लिये कमाई का भी आसरा थी, उनका तो दोहरा नुकसान हुआ है‘‘ विकासदेव राणा जी को पूरी अनुभूति करा रहे थे वो कितने गहरे भंवर में फंसे हैं।
’’तो बताओ मै क्या करूं‘‘ राणा जी ने लाचारी से कहा।
’’आप उनकी बेटी तो नही लौटा सकते पर उसकी कमाई की भरपाई तो कर ही सकते हैं ‘‘ विकासदेव मुद्दे की बात पर आये।
’’कितना दूं ‘‘?
’’कम से कम तीन लाख तो दीजिये ही‘‘।
’’तीन लाख, क्या कह रहे हो अभी तो मुझे इस केस के कानूनी झमेले में ही लाखों खर्च करना होगा ।इतना तो वो हमारे यहां दस बीस साल काम करती तो भी न होता ‘‘ राणा ने भड़कते हुए कहा।
’’तो ठीक है आप खुद ही निपटिये ‘‘विकास देव ने वहां से चलते हुये दांव फेंका।
’’नही नही मेरा यह मतलब नही है‘‘ राणा ने उसे रोका।’’पर कुछ तो रीजनेबल अमाउन्ट बताइये‘‘।
’’चलिये ठीक है दो दे दीजिये‘‘।
’’एक से काम नही चलेगा ‘‘ राणा ने टटोला।
’’आप सब्जी नही खरीद रहे हैं ,किसी की जान गई है ‘‘ विकासदेव ने उठते हुये कहा।
’’हमे भी पता है, तभी तो हम दे रहे हैं नही तो लाख दो लाख रूपये पेड़ से नही टपकते‘‘।
छोनो पक्षों में रस्साकशी चल रही थी उधर हासन और गुनिया अधीरता से दूर से उनकी बात समाप्त होने की प्रतीक्षा में इधर ही दृष्टि गड़ाए थे ।
एक लम्बी बहस और मोल भाव के बाद मामला डेढ़ लाख में तय हुआ।
विकास देव ने जा कर झुमकी के पिता हासन से पसीना पोछते हुये कहा ’’मैने राणा को आड़े हाथें लिया,खूब डांटा फटकारा । अरे क्या बतायें इन पैसे वालों को ,कह रहे थे हासन को पैसे दे कर मामला रफा दफा करो पर हम बिगड़ गये हमने कहा अरे साहब उसके दिल का टुकड़ा गया है उसके आंख की तो रौशनी चली गयी ।‘‘
’’फिर‘‘? हासन ने पूछा।
’’हमने कह दिया वो सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेगा पर सजा दिलवा कर ही मानेगा ,‘‘यह कह कर विकास आगे बढ़ गये ।
हासन घबरा गया उसने दौेड़ का विकास को रोकते हुये कहा ’’अरे माई बाप हमरी कहां कोरट कचहरी की औेकात है दुई जून रोटी तो जुटत नाही । झुमकी थी तो महीने में हजार रूपइया मिलौ जात रहा अउर उ तो साहब के घरै रहती रही ओकर कोई खर्चा नाही था। पर पता नही ओका का सूझी की फंदा डार झूर गई अब तो हमरी कोउ कमइयों नाही बची बाकी बच्चे छोटेै हैं उनकी अम्मा की तबियत ऐसन ही ऊपर वाले के भरोसे है हमका दिन भर मा जो मिलत हेै उससे रोटी भी पूरी नही पड़ती, एकै कथरी का ओढ़ें का बिछावै‘‘।
विकास ने कुछ सोचने की मुद्रा में देखते हुये कहा’’ं हुं देखेंा कोशिश करते हैं ।वह राणा के पास गया । राना ने उसे एक लाख दिये अैार कहा कि पहले केस तो वापस करवाओ अगर कोर्ट में चला गया तो मामला हाथ से निकल जाएगा बाकी बाद में देंगे। विकास ने अपनी काल्पनिक मूंछों पर ताव देते हुए कहा ’’अरे यह विकास देव की जुबान है कोई मजाक नही।‘‘
उसने पैसे अपनी जेब में रखे और हासन के पास आया । हासन ने उन्हे उम्मीद से निहारा, विकास देव ने पचास हजार उसके हाथ में रखते हुये अहसान दिखाते हुये कहा ’’सारी जोर जबरदस्ती करनी पड़ी अरे बड़ी पहंुच वाली पार्टी है ‘‘। हासन का दुख लहराते नोटंो की हवा में घुल कर कम हो गया था। दो जून के खाने ,पूरे कपड़े पहने बच्चे और बीबी के हंसते चेहरों की आस में झुमकी की लटकती गर्दन की छवि ध्ूामिल हो गयी थी ।उसने ऊपर हाथ उठा कर झुमकी को याद करके उसके प्रति पिता होने के कर्तव्य मुक्ति पायी। गुनिया का दिल एक बार बेटी के विछोह सेे कचोट गया पर शेष बच्चों के खिलखिलाते चेहरे उस पर मलहम लगा गये।
दोनो घर की ओर चल दिये उनके कदमों में तेजी थी हासन के हाथ अपनी अंटी को कस कर थामें थे । इतनी बड़ी राशि तो उसने स्वप्न में भी एक साथ नही देखी थी।
उधर शाहिदा  बेगम को जैसे ही इस दुर्घटना के बारे में ज्ञात हुआ अल्पसंख्यकों के प्रति कर्तव्य उछाले मारने लगा और वह अपने सभी महत्वपूर्ण कार्य छोड़ कर थाने की ओर चल पड़ीं। एक अल्पसंख्यक और वो भी अबला स्त्री के प्रति अन्याय की बात सुन कर वो आपे से बाहर हो गयीं।वहां पहुच कर उन्ेहोने पाया कि विकासदेव हासन और गुनिया को घेरे हैं ।अब वोे इसी प्रतीक्षा में थीं कि विकासदेव हटे तो वो हासन और गुनिया से बात करें । हासन और गुनिया को वहां से जाते देख कर वह चैंकी, उन्होने तुरंत अपने कार्यकर्ता को भेज कर हासन को रोका ।उनके गुर्गे ने हासन से पूछा ’’कहंा जा रहे हो ‘‘?
हासन को उनका इस प्रकार रोकना अच्छा न लगा, उसके हाथ अपनी अंटी पर कस गये उसे भय था कहीं शाहिदा बेगम उस धन को लौटाने को न कह दें ।
उसने सप्रयास उपेक्षा के भाव से कहा ’’अपने घर जा रहेै हैं अउर का ‘‘?
’’ तो क्या अपनी बेटी के अपराधियों को ऐसे ही जाने दोगे?‘‘
’’हमरी बिटीवा थी का पता कइसे मरी ,हमका रोटी कय जुगाड़ से फुरसत नाही कि हम ई सब झमेला पाली‘‘।
शाहिदा बेगम उसके इस रवैये से बिफर गयी उन्हे केस अपने हाथ से फिसलता सा लगा।उन्होने शांति से काम लेने में ही भलाई समझी उन्होने कहा ’’देखेा हम तुम्हारे अपने हैें किसी से डरने की जरूरत नही है हम तुम्हारा नही सोचेंगे तो कौन सोचेगा‘‘?

’’पर हम अइसन दिन रात केर रोज रोज के पुलिस कचहरी से बहुत हैरान परेसान हैं अब हमरा पीछा छोड़ देवौ साहिब‘‘ं हासन उनसे पीछा छुड़ाना चाह रहा था ।शाहिदा बेगम ने कहा ’’अरे घर तो जाओगे ही, तुम्हे कौन रोक रहा है पर हम तुम्हे न्याय दिलवा कर रहेंगे‘‘।
’’अरे साहिब हमरे घर की रोजी रोटी लावै वाली चली गयी हमका उकर फिकर है ,ई नयाय वयाय तुम पढ़ै लिखन का झमेला है ,हमैें इतनी फुरसत नाही ।
’’अरे तो हम भी तो उसी का इंतजाम करवा रहे हेंै‘’शाहिदा बेगम ने चारा डाला।
’’मतबल‘‘? हासन ठिठका तो क्या अभी कुछ और मिल सकता है उसने मन ही मन सोचा।
शाहिदा बेगम ने कहा ’’तुम बस जो हम कहें तुम वो करो‘‘। उन्होने वहीं चादर बिछा कर उसे बैठा दिया। अपने साथियों के साथ वो नारे लगाने लगीं ’’हमें न्याय चाहिये ‘‘………. इन सब के मध्य हासन अपने शोक को भूल कर विस्फरित नेत्रों से इस अफरातफरी को देख रहा था। धीरे धीरे उसे अनुभव हो रहा था कि उसकी पुत्री की आत्महत्या की घटना कोई छोटी मोटी घटना नही है जैसी कि उसके गांव में होती थी वहां तो उनकी जठराग्नि उन्हे इतनी मोहलत भी नही देती थी कि वो दो दिन अपने किसी जाने वाले का शोक मना सकें। वो तो अगले दिन ही शेष जीवित लोगों के जीवन को बचाने की चिंता में पड़ जाते थे। पर यहां का दृष्य ही कुछ और था उसकी उसी बेटी जिससे कोई सीधे मंुह बात भी नही करता था उसी के लिये बड़े बड़े लोग अन्याय के विरूद्ध आवाज उठा रहे थे। संभवतः शाहिदा बेगम के साथी मीडिया को सूचना दे चुके थे उनके नारे लगाते ही कैमरे क्लिक होने लगे संवाददाता उनसे प्रष्न पूछने लगे।उन्होने घोषणा कर दी कि और जब तक झुमकी को न्याय नही मिलता दोषी को दंड नही मिलता वह वहां से नही हटेंगीं । सबके आकर्षण की धुरी अब शाहिदा बेगम पर केन्द्रित हो गयी थी, कैमरे और रिपोर्टरों ने शाहिदा बेगम की ओर रूख कर लिया।दो चार दिन शाहिदा बेगम समाचार पत्रों की सुर्खिंयो में छायी रहीं।
धरने के बीच में एक व्यक्ति ने उनके कान में कुछ कहा ।रिपोर्टर उनसे प्रश्न पूछते ही रह गये और वह अचानक वहां से उठ कर कार में चली गयी।
उन्होने न्याय की आस में सड़क पर जमकर बैठे हासन समझाया ’’ अब जो हो गया वो हो गया मैने तुम्हारे परिवार के एक सदस्य के लिये नौकरी का इंतजाम कर दिया है।बाकी बच्चों को भविष्य सुधारो‘‘ हासन का सिर अहसान से झुक गया उसने शाहिदा बेगम को दिल से दुआ दी और दोनो हाथ ऊपर उठा कर अपनी बेटी को याद किया, हासन को लगने लगा कि झुमकी के रूप में उसके घर किसी पाक रूह ने जन्म लिया था जो जाते जाते भी उसके दुख दरिद्र दूर कर गई।
पर्दे के पीछे क्या खेल हुआ किसी को नही पता चल पाया बस आगे का परिदृष्य अवश्य बदल चुका था। श्री राणा और शाहिदा बेगम में कब और कहां एक कष्ती में सवार हो गये कोई जान न पाया । शाहिदा बेगम की पार्टी के अगले इलेक्शन के फंड की राशि में पर्याप्त बढ़ोतरी हो गयी थी। अपनी इस अचानक आयी लोकप्रियता और पार्टी के फंड में बढ़ोत्तरी ने अचानक ही पार्टी में उनके कद को बढ़ा दिया था और इस बढ़े हुये कद ने अगले चुनाव में उनके सांसद के टिकट को पक्का कर दिया था।
केस वापस हो गया था, मि0 राणा और श्रीमती राणा एक बड़ी मुसीबत से बाहर आये थे इसी उपलक्ष्य में उन्होने एक शानदार  पार्टी दी, जिसमें शाहिदा बेगम और विकास देव विशिष्ट अतिथि थे।विकास देव को वांछित धन मिल गया शाहिदा बेगम को प्रसिद्धि, जिसने उन्हे सांसद का टिकट दिला ही दिया और हासन को जीवन यापन का सुदृढ़ आधार। अपनी अपनी उपलिब्धियों की चकाचैंध में किसी को यह जानने का अवकाश  कहाँ  था कि झुमकी ने जान क्यों दी थी।

— अलका प्रमोद 

In Roman

Jhumki Ki Mout

Hasan jhopdi k bahar bidi par bidi fuke ja raha tha ki use achanak khanshi ka dhachka laga aur wah buri tarah khasne laga, khaste – khaste balgam k sath raqut ka thakka bhi nikal aaya. Uske khakharne ki aawaz sun kar guniya jhopdi se bahar aa gayi aur bad badane lagi “ ihan dui jjun ki roti nahi judaat hai aur e sasur bidi me paisa aur jigra duinu fuke pada hai”.

Fir ek aluminium lote me pani uske hath me patakte huwe boli “ aaye do jhumki ka tohar sab kartut bataibe”.

Yah sun kar hasan bifar pada “ kahe jhumki ka koi lard governor hai ki humra fansi chadhaiye dihi, ooi dui bita bhar k chokri humka ukar darr dhikhayi rahi hai…. Hunh”.

“han dui bita ki hai par ohki kamai se ghar ma roti ka jugad hui jaat hai naahi to pet aur pith ek hoi jaat rahai”.

Hasan ne akad kar kaha “ haan to humare bitiya to hai , oo humka tohre se jayada mane hai”

“ ab jyada bhokaal n dikhawow” kahte kahte guniya ko yaad aaya ki chulhe par sabji chadhi hai kahin jal gayi to namak roti khani padegi aur wah andar ko lapki.

Bhukh aur garibi se trast ho kar hasan jab sahar aaya tha to do din tak use aur uske pariwar ko pani par din wayatit karne pade the. Dhire dhire pure pariwar ne mazdoori kar k kisi tarah sahar me sans lene ka jugad kar hi liya tha. Hasan , guniya, ki sabse badi aulad choudah saal ki jhumki, barah ka raju, majdoori karte aur egayarah saal ki muniya chote bhai bahan bittu, aur manji ki dekh bhal karti. Uske gaon ke ramai ne apne bachpan ki yari nibhai, usi ki sahayta se pawn jamane ka asra mila aur usne jhupad patti me ek jhuodi bana li.

Hasan raana sahab ki kothi par majduri ke kaam laga tha hasan ke sath jhumki bhi mazdoorii karne gayi. Raanna sahaba ki maidam ka uski tanmayta se bina ruke kaam karna bha gaya, usne kaha “ main tumhari beti ko apne passs rakhungi wo humare ghar me kaam me sahayta karegi aur hum use padhayenge”.

‘ par hujur humka chori ko pladhay ke ka kare ka hai, majuri karke kachu paisa kamay lete hain”

“ are to haum koi muft me kaam thode hi karayrnge pure hazar rupaye denge aur tumhari beti ka kahana, pahanna , padhna muft” misses raana ne kaha.

Hasan ko souda labh ka laga, dono hath me ladoo, ek hazar rupaye hath me aur ek pet k khane ka bhar kam.

Jhumki raana ji k ghar kaam karne lagi kuch hi dino me hi uski to chaal dhal hi badal gai. Uski bhasa boli pahanne odhne ka andaj sab badal gaya. Ab uski boli me gaon ki gawai boli ka asthan khadi boli leti ja rahi thi. Ache khane ne uski dhul me chhipi lunai ko barsat k baad dhuli pankhuri sa nikhar diya tha, jun se bhare rukhe keson ki jagah shampoo kiye kareene balloon ne le li thi. Maidam k reject kiye kapde me wah sadak par lage poster ki nayika se swaying ki tulna karne lagi thi. Har mahine me ek baar ghumki ghar aati to use samajh nahi aata ki us kachhe makan ki kachhi jamin par kaha baithe. Jab wah amma bappa ke hath me ek hazaar rupye rakhti to anjane hi uske aage amma bappa ka kad bona ho jata aur chote bhai bahan hasrat se uske kapde chu chu kar dekhte.

Sab kuch thik tha ki achanak us subah das baje kisi ne aa kar hasan se kaha “ tumhari bitiya ne fansi laga li”.

Hasan aur uski bibi guniya hakbak rah gaye, abhi pichle hafte to jhumki aaye thi tab to sab thik tha. Kuch chann to wah sangya sunya ho gaye fir jab baat samajh me aayi wo jis haal me the ranna ji ki ghar ki taraf doud pade. Unke kadam to mano sath hi chod de rahe the dono yahi mana rahe the ki jhumki ke upar kaouwa baitha ho isiliye uskii lambi umar ki khatir unhe yah khabar di gayi ho. Unka bawara man yah nahi soch paya ki aisa jhumki ka koun hitaisi baith hai jo uski lambi umar ki khatir itna bakhera karega.

Ranna ji k ghar me jamin par unki beti saada k liye aankhe munde padi thi. Hasasn aur guniye uske sarir se lipat kar dahad mar kar ro pade, wo man bhar rob hi nahi paye the ki vikash dev unhe utha kar bahar le aaye . unho ne us se kaha “ tum pahle thane chalo , fir raanaa ji se nibtna”.

Hasan ne kaha “ thane kahe are kou batawa hai ki humri bitiwa kuchu kar lihis aur aap humhi ka thane le jaye rahe hain.”

Vikash dev ne kaha “ isiliye to hum kah rahe hain ki thane thane chal kar reoirt likhwao”.

Beti ko dekhne ko bechain guniya ne kaha “ sahab humka apni bitiwa man bhar dekhe ka hai ka pata aabhi jan bachi hoy aurr jawe, tum humka biche me n atkaw”.

Dukhi hasan ko vikash dev ki duniya dari ki baten is samay sul sa chubh rahi thi usne virodh kiya” humka korat kach hari ma nahi pare ka hai sahib”.

“ are hadd karte ho tumhari beti ko mar diya aur tumhe aise hi chor doge , apni beti ka badla bhi nahi loge” vikash dev ne unhe bhadkaya.

“ par sahab maidam ji to oka bahut chahe rahin humka to yahu nahi pata ki hua ka hai   huka to bas oke dekhe ka hai” hasan ne kaha.

“ tum bahut bhole ho are tumhari beti mari hai wo bhi miss rana k ghar par”.

“ par ek bar oh se puchhoo to ka hua, suna hai wah kudaye mari gayi”. Fir kuch sochta sa bola “ waise sahib humri bitiwao kam garam dimag ki nahi rahi, ka pata ka hua. Aur sahib u bare log unker humri bitiya se ka dusmani aur sau baat ki ek baat unka saja diraye se humri bitiwa to humka milihain nahi”.

“par e hai ki agar unke bare humri bitiya mari hai too humara sarap unke chodihen nahi”.  Guniya ne kaha.

Vikash dev ne sir tham liya unhe laga guniya ko samjhaya ja sakta hai wo guniya se bole “ ye to sirfira hai” unhone unhe sidhe sidhe samjhaya “ dekho yah koi choti baat nahi hai tumhari bitiya gai hai wo bhi rana ji k ghar me usne aatmhatya ki hai , muwabja to unko dena hi hoga”.

Guniya ko baat samah me aaa gai usne hasan ko gudka “ are jhumki ke bapu humri jhumki ko to uai mar dihen. Uai to gai par char pirani jo hain unka ka hoibe ab humra kharcha pani kaise chalihen”.

Yah sun kar hasan ko hos aaya aur beti ke bichoh me wyathit pita ka gala ghont kar duniyadar insane haga. Usne ghatna  ka yah pakash socha hi nahi tha. Achanak hi use bidi ki talab lagne lagi aur use apne upar krodh aaya ki use ab tak murkh vikash dev ke kahne ka arth  kyu nahi samajh raha tha. Beti to hath se gayi hi use thodi der bad dekha ja sakta hai pahle to vikash dev ke sath thane jana hoga report likhwane.

Jis samay jhumki ne aatmhatya ki us samay sri rana ke ghar me kewal unki patni hi thin. Yadpi unke anusar wo to apne kamre me T. V. dekh rahi thi aur unhe nahi pata ki jhumki ne aisa kyu kiya. Par aisa kahne se unhe nirdos nahi mana ja sakta aur fir unka koi dos bhale na ho nabalig larki ko kaam pe rakhne ka apradh to banta hi tha. Wo bhale hi kahti rahin ki jhumki ke pariwar ki sahayta k liye use padhane k liye, uski zindgi sudharne k liye apne pass rakhe thin aur sach kuch bhi ho par media aur hawa me faile charchon k gubbar aur paristhitiyan sak ki sui unhi ki or mod rahi thi.

Jab misses rana ko lock up se court le jane k liye jaya jane laga to waha jama bheed  eka ek chaitanya ho gai mano unke jiwan ki sarthakta unhe dand dilane me hai hai. Sare ke sare log jeep ko charon or se gher liya.

“ paise wale hos me aao, khuni ko saja do, garib bhi insan hai use bhi insaf chaiye………………………. .. “  ke nare gunjne lage. Kuch log jeep par dande marne lage, badi kathinta se police ugra hoti bhid ko rokne ka asafal prayas kar rahi thi antath vikash dev ne aa kar bheed ko sant rahne ka isara kiya aur sree rana k car k passs pahuche. Unhone sree rana ki gadi rok kar unhe bahar aane ka sanket kiya. Sree rana ko ek kinare le ja kar vikash dev ne kaha” agar aap is bheed k is gusse se bachna chahte hain to main yah kaam kar sakta hu”.

“ aap bataiye main kya karu kisi tarah is bheed ko rokiye, main to aise hi bhut paresan hu upar se yah bheed aur musibaat kiye hai”.

Dekhiye us garib ki beti gayi hai aur kisi bhi insan k liye chahe wah garib ho ya amir jaaan se jyada kuch nahi hota”

“ haan main manta hu par isme meri patni ka koi dos nahi hai. Wo to uska bahut dhayan rakhti thi ab usne jaan de di to main kya karu” sree rana ne pasina pochte huwe kaha.

“ dekhiye sahaab  jiski bachhi ki jaan gayi hai uske liye to jo uska rakhwala tha wo hi dosi hoga, kuch bhi ho aapke ghar ghar par uski beti ki jaan gayi hai to jimmedari to aapki hi hai” vikash dev ne unhe dabaw me lete huwe kaha, fir unka utra chehra dekh unhe samajh aa gaya ki teer nisane par lagi hai. Wo unke kandhe par hath rakhte huwe bole “ waise dekhiye meri sahanubhuti aap k sath hai”.

Sree rana ko vikash dev dubte  me tinke ka sahara lage, wah turant vikash dev ka hath tham kar bole “ to batao main to kuch bhi karne ko taiyar hu”.

“ waise to kisi ke liye bhi uska bachha anmol hota hai aur jhumki to apne ghar k liye kamai ka bhi aasra thi, unka to dohra nuksan hua hai”  vikash dev rana ji ko puri anubhuti kara rahe the ki wo kitne gahre bhawaar  me phase hain.

“ to batao main kya karu” rana ji ne lachari se kaha.

“ aap unki beti to nahi louta sakte par uski kamai ki bharpai to kar hi sakte hain” vikash dev mudde ki baatt par aaye.

“kitna dun”

“ kam se kam teen lakh to dijiye hi”

“ teen lakh ,kya kah rahe ho abhi to mujhe is case k kanuni jhamele me hi lakhon kharch karna hoga. Itna to wo humare yahan das bis saal kaam karti to bhi na hota” rana ne bhadakte hue kaha.

“to thik hai aap khud hi nibatiye” vikash dev ne waha  se chalte huwe daaw feka.

“ nahi nahi mera yah matlab nahi hai” rana ne use roka” par kuch to reasonable amount bataiye”.

“ chaliye thik hai do de dijiye”.

“ek se kaam nahi chelega” rana ne tatola.

“aap sabji nahi kharid rahe hain, kisi ki jaan gayi hai” vikash dev ne uth te hue kaha.

“ hume bhi pata hai tabhi to hum de rahe hain nahi to lakh do lakh rupay ped se nahi tapaltte”.

Dono pakshon me rasa kassi chal rahi thi udhar hasan aur guniya adhirta se dur se unki baat samapt hone kipratiksha me idhar hi dristi gadye the.

Ek lambi bahas aur mol bhaw k baad mamla dedh lakh me tay hua.

Vikash dev ne ja kar jhumki k pita hasan se pasina pochte hue kaha “ maine rana ko aade hathon liya, khub data , fatkara. Are kya batayen in paise walon ko, kah rahe the hasan ko paisa de kar mamla rafa saffa karo par hum bigad gaye humne kaha are sahab uske dil ka tukda gaya hai uske aankh ki to roshni chali gayi hai”.

“ fir” ? hasan ne pucha.

“ humne kah diya wo supreme  court tak larega par saja dilwa kar hi manega, “ yah kah kar  vikash aage badh gaye.

Hasan ghabra gaya usne doud kar viksh ko rokte hue kaha “ Are mai baap humri kahan kachri korat ki awkat hai dui joon ki roti to jutat nahi. Jhumki thi to mahine me hazar rupaiya miloo jaat raha aur u to sahab k ghare rahti rahi okar koi kharcha nahi tha. Par pata nahi oka ka sujhi ki fanda darrr jhur gayi ab to humri koi kamaiyo nahi bachi baki bachhe chote hain unki maa ki tabiyaat aisan hi upar wale k bharose hai humka din bhar me jo milat hai ussse roti bhi puri nahi parti, eke kathri ka odhe ka bichawe”.

Vikash ne kuch sochne ki mudra me dekhte hue kaha “ hun dekhen kosis karte hain. Wah rana ke pas gaya. Rana ne use ek lakh diye aur kaha ki pahle case to wapas karwao agar court me chala gaya to mamla hath se nikal jayega baki baad me denge. Vikash ne apni kalpnik muchon paar taw dete hue kaha “ are yah vikash dev ki juban hain koi mazak nahi”.

Usne paise apne jeb me rakhe aur hasan k pass aaya. Hasan ne unhe ummid se nihara, vikash dev ne pachas hazar uske hath me rakhte hue ehsan dikhate hue kaha “ sari jor jabarjasti karni padi are bahut pahuch wala party hai”.hasan ka dukh lahrate noton ki hawa me kam ho gaya tha. Do jun k khane, pure kapde pahne bachhe, aur biwi k haste chehron ki aas me jhumki ki latakti gaardan ki chawi dhumil ho gayi thi. Usne upar haath utha kar jhumki ko yaaad kar k uske prati pita hone k kartawya mukti payi. Guniya ka dil ek bar beti ke bichoh se kachot gaya par ses bachon ke khil khilate chehre uspar marham laga gaye.

Dono ghar ki or chal diye unke kadmo me tezi thi hasan k hath apne anti ko kas kar thame the. Itni baari rasi to usne swapn me bhi ek sath nahi dekhe thi.

Udhar sahida begum  ko jaise hi is durghatna k bare me gyat hua alpsankhayako k prati kartabya uchhal marne laga aur wah apne sabhi mahawaatapurn karyon ko chod kar thane ki or chal padin. Ek alpsankhayak aur wo bhi abla atree  k prati anyay ki baat sun kar wo aape se bahar ho gayin. Waha pahuch kar unhone paya ki vikash dev hasan aur guniyan ko ghere hai. Ab wo isi pratiksha me thi ki vikash dev hate to wo hasan aur guniya se baat kare. Hasan aur guniya ko waha se jate dekh kar wah chounki, unhone turant apne karyakarta ko bhej kar hasan ko roka. Unke gurge ne hasan se pucha “ kahan ja rahe ho”?

Hasan ko unka is prakar rokna achha nahi laga, uske hat h apni anti par kas gaye use bhay tha kahin sahida begum us dhan ko lautane ko na kah de.

Usne sprayas upecha k bhaw se kaha “ ghar ja rahe hain aur ka”?

“ kya apne beti ki apradhi ko aise hi jane doge??”

“ humri bitiwa thi ka pata kaise mari, huka roti k jugad se fursat nahi ki hum e sab jhamella pali”.

Shahida begum uske is rawaiwe se  bifar gayi unhe case apne hath se fisalta sa laga. Unhone santi se kaam lene me hi bhalai samjhi unhone kaha  “ dekho tum hamare apne ho kisi se darne ki jarurat nahi hai hum tumhara nahi sochenge to koun sochega”?

“ para hum aisan din raaat ker roj roj k police kachari se bahut hairan paresan hain ab humra picha chod dewao sahib” hasan unse picha chudana chah raha tha. Shahida begum ne kaha “ are ghar to jaoge hi , tumhe kaoun rok raha hai par hum tumhe nayay dilwa kar rahenge”.

“ are sahib humre ghar ki roji roti lawe wali chali gayi humka ukaar fikarr hai, e nayay wyay tum padhe likhan ka jhamela hai, hume itni fursat nahi.

“ are hum bhi to usi ka intzam karwa rahe hain. Shahid begum ne chaara dala.

“ matalb” ? Hasan thithka to kya abhi kuch aur mil sakta hai usne man hi man soncha.

Sahida begum ne kaha “ tum bas jo hum kahe wahi karo”. Unhone wahin chadar dal kar use baitha diya. Apne sathiyon k satha wo nare lagane lagi “ hume nayay chahiye”………………. . In sab k Madhya hasan apne sok ko bhul kar wisfarit netron se is afra tafri ko dekh raha tha. Dhire dhire use anubhaw ho raha tha uski putri ki aatmhatya ki ghatna koi choti moti ghatna nahi hai jaisi ki uske gaon me hoti thi wahan to unki jatharagni unhe itni moholat bhi nahi deti thi ki wo do din apne kisi janewale ka sok mana sake. Wo to agle din hi ses jiwit logon k jiwan ko bachane ki chinta me pad jate the. Par yaha ka drishya hi kuch aur tha uski usi beti jis se koi sidhe muh baat bhi nahi karta tha usi k liye bade bade log anyay k virudh aawaj Utha rahe the. Sambhawtah shahida begum k sathi media ko suchna de chuke the unke nare lagate hue camere click hone lage samwadata unse prashna puchne lage. Unhone ghosna kar di ki aur jab tak jhumki ko nayay nahi milta dosi ko dand nahi milta wah wahan se nahi hatengi. Sabke aakarsan ki dhuri ab shahid begum par kendrit ho gayi thi, camere aur reporteron ne shahida begum ki or rukh kar liya. Do char din shahida begum samachar patron ki surkhiyon me chhayi rahin.

Dharne k bich me ek waykati ne unke kaan  me kuch kaha. Reportor unse prasna puchte hi rah gaye aur wah achanak waha se uth kar car me chali gayi.

Unhone nyay ki aas me sadak par jamkar baithe hasan ko samjhaya “ ab jo ho gaya wo ho gaya maine tumhare pariwar k ek sadasya k liye noukri ka intjam kiya hai. Baki bachhon ka bhawisya sudharo” hasan ka sarir ehsan se jhuk gaya usne shahida begum ko dil se dua di aur dono haath upar utha kar apni beti ko yaad kiya, hasan ko lagne laga ki jhumki  k rup me uske ghar kisi pak ruh ne janm liya tha jo jate jate uske dukh daridra dur kar gayi.

Parde k piche kya khel hua kisi ko nahi pata chal paya bas aage ka drisya jarur badal chukka tha. Shree rana aur shahida begum kab aur kahan ek kasti me sawar ho gaye koi jan n paya. Shahida begum ki party k agle election k fund ki rasi me paryapt badhotri ho gayi thi. Apni achanak aayi is lokpriyata aur party fund me badhotri ne achanak hi party me unke kad ko badha diya tha aur is badhe hue kad ne agle chunaw me  unke sansad k ticket ko pakka kar diya tha.

Case wapas ho gaya tha MR. Rana aur Smt Rana ek badi musibat se bahar aaye the isi k uplaksh me ek sandar party di, jisme shahida begum aur vikash dev visist atithi the. Vikash dev ko wanchit dhan mil gaya shahida begum ko prasidhi jisne unhe sansad ka ticket dila hi diya aur hasan ko jiwan yapan ka sudridh aadhar. Apni apni uplabdhiyon ki chaka chondh me kisi ko yah jan ne ka awkas kaha tha ki jhumki ne jaan kyu di.

— Alka Pramod

 

 

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2 Comments

  1. Kavita Mukhar September 14, 2016 at 5:25 pm

    दांव पेंच से सुसज्जित कहानी।

    Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
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  2. संजय सरोज March 22, 2018 at 11:50 am

    सामाजिक ठेकेदारों का अनर्गल अत्याचार और गरीब की मानसिकता का मार्मिक चित्रण

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