क्या नाम दूँ

मेरा  बेटा, समय कैसे पंख लगा उड़ जाता है ! तब की इसकी शैतानियाँ और नादानियाँ दोनों ही प्यारी लगती थी. लंबे- लंबे बालों में बिल्कुल लड़कियों  सा लगने वाला ये बच्चा ना जाने क्या – क्या कर जाता था. गाँव हो या शहर लोगों में दूसरों के बच्चे के प्रति प्रेम और सहिष्णुता तो जैसे बे-मायने हो गए हैँ, आये दिन कितनी ही शिकायतों का सामना करना पड़ता था मुझे. परंतु जरा इस ” शेरू” को देखें, गाँव के हमारे आँगन में पलने वाले इस कुत्ते को देखें, जिसे तो सिर्फ अपने हिस्से का खाना ही मात्र मिलता था. परंतु ऐसी कौन – सी तार इनकी आपस में जुड़ गई थी की वो हमेशा मेरे बेटे के इर्द-गिर्द ही रहता था. और मेरा बेटा! माशाअल्लाह उसे भी तंग करने में बाज़ नहीं आता. कभी उसके दोनों कान खींचता तो कभी टाँगे. सो रहा होता तो उस पर पानी फेंक देता, पर इस शेरू ने एक बार भी धमकाया नहीं, बल्कि अगर बेटा किसी के आँगन या बाज़ार भी जाता तो शेरू उसके पीछे पहुँच जाता.
इन्हीं सबों के बीच वो दिन भी आ गया जब बेटे का मुंडन संस्कार हो. घर मेहमानों से भरा, पर्दा प्रथा के अनुसार मैं बहु के रूप में आँगन से बाहर जा नहीं सकती थी.तभी दोपहर के वक्त मुझे अंदेशा हुआ कि बेटा कही आस-पास नहीं है. रिश्तेदारों ने जहाँ-तहाँ खोजना शुरू किया, पर निराश ही हुए. तभी ध्यान आया की शेरू भी आसपास में नहीं है. लोग शेरू को आवाज़ लगाने लगे. तभी किसी राहगीर ने जो कि उस नदी में नहा अपने घर को जा रहे थे और पहचान के भी ,उनसे पता चला की आँगन के पीछे खेत और अमराई पार कर नदी के किनारे खड़े हो पानी में पत्थर मार रहे हैं साहब. और तभी जनाब की नज़र इन पर पड़ी तो इन्हें वापस अपने साथ ला रहे थे और साथ में था शेरू☺. हद तो तब हुई जब हम एक दिन अपने किसी संबंधी के यहां गए. शेरू मेरे बेटे को घर में ना पाकर वह पूरे दिन रोता रहा. जब वापस आये तो बस पूछिये मत. और फिर वो दिन भी आ गया जब हमें गाँव से विदा लेना था. वापिस जब शहर पहुँची तो गाँव का हाल चाल पता किया तो पता चला की शेरू लोगों के लिए कई दिनों तक एक किस्सा बना रहा ,हैरानी का कारण बना रहा. इतनी आत्मीयता और इतना प्यार , जिसकी बिछुड़न का दर्द इंसान तो सम्भाल भी ले पर यह एक अदना सा जीव जिसके पास मन और दिमाग तो है पर शब्दों के लिए जबान नहीं. पर हम इंसान हमेशा इस बात को भूल जाते हैं कि प्रेम की अपनी एक अलग भाषा होती है जिसे शब्दों और अल्फ़ाज़ों का मोहताज़ नहीं होना पड़ता है. अगर इस बात में सत्यता नहीं होती तो शेरू के प्रेम , बिछुड़न का दर्द और मिलन की तड़प को वहाँ के लोगों ने शायद महसूस भी ना किया होता.
क्यों इंसान ज्यों- ज्यों बड़ा होता है और परिपक्व भी ,उसमें विवेकहीनता क्यों आ जाती. संबंधों के प्रति विरक्ति क्यों, जबकि हर एक इंसान के सामने उसके आस-पास के मजबूर हालात हमेशा परिलक्षित और परिदृशयित् होते रहते हैं जिसका शिकार इंसान अपने  जिंदगी के आखिरी पड़ाव तक कभी ना कभी भुक्तभोगी तो होता ही है . इस तथ्य को जानते हुए भी कोई इस कदर मजबूर क्यों ?????
— अपर्णा झा 

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