सफरनामा

सफरनामा था वो जिस पर हमने भी कदम रखा था,
निकल पड़े थे अकेलेे मगर फिर कारवाँ भी बन गया था।
भीड़ के साथ खड़े थे ,अपने पर नाज था
मगर जब जरूरत थी सबकी
तो खुद को तन्हा पाया….
कुछ वेचैन थे तो कुछ उदास भी…
फिर एक आवाज आई….” मैं हूँ न”…
इधर देखा फिर उधर देखा ….
मगर नजर कुछ न आया।
फिर अंतर्मन टटोला तो एक आस थी,
वो थी उम्मीद, दिल की खिड़की खोले, प्यार से मुझे सहलाते हुए ढाढस बन्धाते हुए…
ले चली मुझे, किस ओर,न जाने कहाँ ?
मगर यह सफर था कुछ जाना सा , कुछ पहचाना सा.
दिल के अरमान लुटाते हुए खुद को सहलाते हुए..
कलम थी, कागज थाऔर कुछ भाव थे.
उन्हें पन्नों पर उतारते हुए निकल पड़ी हूँ.
उसी उम्मीद का सहारा लिए,आज फिर इस सफर की ओर….
मंजिल मिले न मिले बस सकूँ की तलाश में,
जो शायद अब तक अधूरी ही था ।
दिल के अरमानो को उतारते हुए पूरी हुई….

प्रेक्षा शर्मा

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