बाबा धाम की यात्रा

बात उन दिनों की है,जब मैं इंटर की परीक्षा पास कर मेडिकल टेस्ट की तैयारी कर रहा था। बी एच यू, बाराणसी सेंटर था -‘पी एम टी’ का। पिताजी एक किसान थे,बड़ी कठिनाई से पैसों का जुगाड़ हो पाता था।
पिताजी ने यात्रा खर्च के पैसे देते हुए कहा ठीक है बेटा, बनारस जा रहे हो तो परीक्षा देकर बलिया भी चले जाना। गोपालपुर से अपनी मां को भी लेते आना। बहुत दिन हो गए उसे गोपालपुर गए। यद्दपि मैं किशोरावस्था में था,पर मुझे यह समझते देर न लगी कि पिताजी ने पैसे दीवान चाचा से उधार लिए थे ताकि वे गोपालपुर जाकर माँ को ला सकें। कुछ सुकून उन्हें हुआ ,चलो उधारी के पैसों से दोनों काम हो जायेंगे,कहीं और हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा।
मैं पिताजी के चरण स्पर्श कर उनसे आशीष लेकर दानापुर फ़ास्ट पैसेंजर से बनारस हेतु प्रस्थान किया। यह सोच कर कि पैसेंजर गाड़ी से कुछ पैसे कम लगेंगे, मैंने बनारस की टिकट खरीदी। बनारस के बीएचयू सेंटर में इम्तहान देकर टाँगे से स्टेशन जाकर बलिया हेतु लोकल ट्रेन से प्रस्थान किया।
गोपालपुर मेरा ननिहाल है। ननिहाल जाने की ख़ुशी तो थी ही, उससे भी अधिक ख़ुशी यह सोच कर हो रही थी कि 4-5 महीनों के बाद माँ से मिलूंगा। माँ से मिलने की ख़ुशी को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। जब नानाजी ने माँ को विदा किया तो उनकी आँखें रो रही थीं और माँ भी उदास थी।पर विदा होकर मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा।
माँ के साथ बस से बक्सर स्टेशन आया। तो माँ ने कहा,बेटा क्यों न जसीडीह होके चल जाय:; देवघर में मंदिर दर्शन कर लेंगे। बड़े दिनों से देवघर मंदिर दर्शन की चाह थी।” भोर की बेला थी। जसीडीह स्टेशन उतर कर राज्य ट्रांसपोर्ट की दुमका जानेवाली बस पकड़ी गई।कुछ ही समय में हम लोग देवघर पहुँच गए। आगे केबिन की सीट थी। ड्राइवर साहेब से पता लगा 1 घंटे बाद यही बस डायरेक्ट दुमका जायेगी। माँ की खुशी का ठिकाना न था। माँ ने कहा- “बेटा क्यों न सामान यहीं रहने दिया जाय: निश्चिन्त होकर बाबा के दर्शन कर हमलोग एक घंटे के अंदर वापस आ जायेंगे”।माँ के विचार अच्छे लगे।सामान बस में ही छोड़ कर तुरंत एक रिक्शा पकड़ कर हमदोनों मंदिर दर्शन को प्रस्थान कर गए। माँ बड़ी ही धार्मिक महिला थीं। सभी देवताओं के दर्शन,पूजन कर हम लोग वापस बस अड्डे पहुंचे। बीआर एल 1786 नंबर की हमारी बस थी। उस बस हमलोग ढूंढने लगे। काफी देर तक पता लगाने के बाद इन्क्वायरी से पता चला की वह बस तो थोड़ी देर पूर्व ही दुमका हेतु प्रस्थान कर गई।बीच में कहीं भी स्टॉपेज नहीं था। सुपर बस थी। मेरी मनस्थिति मत पूछिए। कपड़े लत्ते के अलावे मेट्रिक,इण्टर के सारे कागजात सूट केस में रखे थे। गुस्से में मैंने माँ को कहा,”मंदिर में मैंने तुम्हे जल्दी करने को कहा,पर तुम तो जैसे ध्यान में खोई रही। अब क्या करूँ? मेरे सारे पेपर्स चले गए। माँ चुप रही। बेचारी करती भी तो क्या करती।
उन दिनों आज जैसे मोबाइल तो थे नहीं। लैंडलाइन से भी बड़ी मुश्किल से बातें हो पाती थी। टैक्सी भी नहीं मिला। इस बीच काफी समय निकल गया।दुमका के लिए दूसरी लोकल बस कोई घंटे भर बाद थी।निरुपाय और असहाय होकर हम दोनों उस लोकल बस में जा बैठे। मैं माँ को लगातार कोसता रहा। मैं गुस्से में कहे जा रहा था,”” माँ, ये मंदिर, ईश्वर,पूजा पाठ सारे ढकोसले हैं। विज्ञान इन पर विश्वास नहीं करता । तुम्हारे कारण सब सामान चले गए। मेरे मार्क्स शीट, सर्टिफिकेट्स अब कैसे मिलेंगे? मेरे भविष्य का क्या होगा,आदि आदि। माँ बहुत विषाद में थीं। दुःख से उनकी आँखे बंद थी। वह बेसुध सी कहती जा रही थी, “बेटा धीरज रखो, दुमका में सारे सामान मिल जायेंगे। माँ को गहरा आघात लगा था। उसकी आँखे डबडबा गयी थी। कोई अन्य समय होता तो मैं भी माँ के आँचल में छुप के जी भर कर रोता। मैं शुरू से काफी भावुक रहा हूँ, माँ की बेदना मेरे लिए सदा असहनीय थी। किन्तु इस समय तो मेरी आँखों के समक्ष प्रथम श्रेणी में उत्तीर्णता के मेरे सारे प्रमाणपत्र नाच रहे थे। मेरे सारी भावनाएँ मृत हो गई थीं। माँ को उलाहने देता रहा। ईश्वर के प्रति अनादर के भाव लगातार मेरी बेचैनी को बढ़ा रहे थे।
इस बीच हमारी लोकल बस भी तेजी से भागे जा रही थी। शायद बासुकीनाथ आनेवाला था। यात्रियों के मुखसे बाबा बासुकीनाथ की जय के उदघोष आकांश में गुंजायमान हो रहे थे। माँ के अधर भी कदाचित बाबा नाम उच्चारित कर रहे थे। इस बीच मुझे आगे सड़क पर एक बस खड़ी दीखी। हाँ ,उस बस के पीछे नेम प्लेट में मुझे बी आर एल 1786 नंबर दिखाई पड़ा। शायद यह वही बस थी। “ड्राइवर साहिब , बस रोकिये,” मैं चिल्ला पड़ा। और बस के धीमे होते ही नीचे छलांग लगा दी । फिर दौड़ कर उस बस पर जा कूदा। आगे केबिन वाली सीट के ऊपर से झपट्टा मारकर अपने दोनों सूट केस लेकर झट से अपनी लोकल बस में तेजी से चढ़ गया।
माँ की आँखों से अश्रु जल टपक पड़े। फिर उसने कहा, “जानते हो बेटा, कुछ समय के लिए तो मेरा भी विश्वास डगमगाने लगा था। किंतु मैं दृढ़ थी। ईश्वर की सच्ची भक्ति,पूजा, में शक्ति होती ही है बेटा। कभी भी,उस ब्रह्मांड की शक्ति और उनके अस्तित्व पर अविश्वास न करना।उनकी लीला अपरंपार है। सत्य की राह पर अडिग रहते हुए ईश्वर से सच्चा प्रेम करना”।
आज इस घटना के कई वर्ष गुजर गए। आज मैं सोच रहा हूँ, “सच में कोई ऐसी असीम शक्ति तो है ही, जिससे समस्त सृष्टि ऊर्जावान रहती है। उसे कोई भी नाम दें। वही ईश्वर है। वही दृढ विश्वास है। जीवन की यात्रा में कई पड़ाव आते हैं। पर बिना विचलित हुए पथिक इस यात्रा पथ में आगे बढ़ते जाता है।
जीवन भी एक यात्रा है। कोई एक अदृश्य शक्ति इस यात्रा का सञ्चालन करती है। कब कोई चमत्कार हो जाये, कोई नहीं जानता। आज माँ नहीं है। शायद विलीन हो गई उस शक्ति में। अब जाकर विश्वास हो रहा है- भक्ति में शक्ति है।

विनोद कुमार मिश्र

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