अंधविश्वास—कुछ अज्ञान कुछ विज्ञान

जिस समय में आज हम जी रहे हैं वह निश्चय ही विज्ञान की देन है। विज्ञान की नित नई खोजों द्वारा जीवन सुखद और सरल हो रहा है। ऐसे में धर्म से जुड़ी मान्यताएँ धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खो रही हैं। धार्मिक मान्यताएँ अधिकतर अंधविश्वास पर आधारित होती हैं। अंधविश्वास का अर्थ है बिना किसी तर्क के किसी मान्यता पर किया गया विश्वास। यदि कोई मान्यता बिना किसी तार्किक प्रयोग अथवा अवलोकन के मान ली गयी है तथा वह मानव के हित में नहीं है तो निश्चय ही उसे त्याग देना चाहिए। किन्तु वे अवधारणाएँ जिनके पीछे कोई कारण विशेष है, उन्हे अपनाने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।

विज्ञान के गहन अध्ययन का एक लाभ यह हुआ है कि हमारे समाज में सदियों से चले आ रहे कुछ अंधविश्वासों के पीछे छुपे हुए कारणों को हम समझ पाए हैं। बचपन से सुनते आ रहे हैं कि रात के समय पेड़ों से दूर रहना चाहिए। कहना न होगा कि विज्ञान के माध्यम से अब यह ज्ञात ही है कि रात के समय पौधे ऑक्सीज़न ग्रहण करते हैं तथा कार्बन-डाइ-ऑक्साइड छोड़ते हैं तथा दिन में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के कारण वे कार्बन-डाइ-ऑक्साइड ग्रहण करते हैं। अतः दिन में उनके आस-पास रहना अत्यंत लाभकारी किन्तु रात्रि में उतना ही हानिकारक होता है। किन्तु पीपल वृक्ष से दिन-रात ऑक्सीज़न ही बाहर निकलती है। यही कारण है कि इसे ‘देववृक्ष’ अर्थात देवताओं का वृक्ष कहा गया है।

एक अन्य धार्मिक मान्यता है कि तुलसी के पत्ते को सीधा निगल लेना चाहिए, चबाना नहीं चाहिए क्योंकि वे भगवान विष्णु की पत्नी हैं और चबाने से उनका निरादर होता है। इस मान्यता के पीछे कारण यह है कि तुलसी में ‘मरकरी’ नामक रासायनिक पदार्थ पाया जाता है जो दाँतों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। अतः उसे चबाने से रोकने के लिए ही ऐसा कहा जाता रहा होगा।

एक अन्य मान्यता के अनुसार सूर्यास्त के बाद घर में झाड़ू नहीं लगानी चाहिए। इसके पीछे तो यही तर्क लगता है कि पुराने समय में बिजली का आविष्कार नहीं हुआ था जिसके कारण शाम के बाद काम-काज हल्के प्रकाश में करना पड़ता था। अंधेरे में झाड़ू लगाने से घर के कोनों में छुपे हुए बिच्छू या कोई अन्य विषैले जीव-जन्तु काट न लें, इस बात की शंका रहती थी। इसके अतिरिक्त कोई कीमती वस्तु जैसे सोने की अँगूठी या पैर के बिछुए यदि गिर गए हों तो कूड़े के साथ-साथ उनको भी फेंक दिये जाने की संभावना हो सकती थी। नाखून रात में काटने से रोकने के पीछे भी यही कारण लगता है कि हल्की रोशनी में हाथों में कोई चोट या खरोंच आदि न लग जाए।

सूर्यग्रहण के समय घर से बाहर निकलने से सदैव हमें रोका जाता रहा है। सूर्य और पृथ्वी के बीच जब चंद्रमा आ जाता है तो वह सूर्य को पूर्ण या आंशिक रूप से ढक लेता है । उस समय  प्रकाश की किरणों में विवर्तन होता है अर्थात वे टकराकर मुड़ती हैं। इन किरणों का आँखों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि बाहर जाने को मना किया जाता है।उस समय सूर्य का प्रकाश भी पृथ्वी तक पूरी तरह पहुँच नहीं पाता।अतः सूर्य का कीटाणुओं पर पड़ने वाला लाभकारी प्रभाव भी कम हो जाता है,इसी कारण रखे हुए खाद्य पदार्थों को भी खाने से रोका जाता था। किसी भी समान्य दिन प्रातःकाल की सूर्य किरणें आँखों के लिए लाभप्रद होती हैं। अतः सूर्य नमस्कार का विधान है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार अंतिम संस्कार से लौटकर नहाने और उन कपड़ों को तुरंत धो देने का नियम है। इसे प्राय धार्मिक रूप से अनिवार्य समझा जाता है। इसके पीछे भी वैज्ञानिक कारण है। ऐसे स्थान पर विभिन्न प्रकार के रोगाणु हो सकते हैं। उनका प्रभाव व्यक्ति व घर पर न पड़े, इसी उद्देश्य से यह परम्परा चली आ रही है।

परीक्षा के लिए घर से निकलते हुए भारत के कुछ क्षेत्रों में दही व मिठाई खिलाने की परम्परा है। दही से पेट ठीक रहता है। चिंता से कभी-कभी पेट में  अम्ल बनने लगता है और जलन होने लगती है।दही उस स्थिति में रामबाण सिद्ध होता है। परीक्षा के दिनों में  मानसिक तौर पर थकावट होने से बार-बार कुछ खाने की चाह होती है। मीठा खा लेने से शरीर को ऊर्जा मिल जाती है तथा मानसिक रूप से भी व्यक्ति संतुष्ट महसूस करता है।

नदी या कुएं में सिक्के डालने का प्रचलन भी है। पहले पीने के जल का स्रोत यही हुआ करते थे और सिक्के अधिकतर तांबे के होते थे। तांबा पानी में मिलकर विशेष प्रभाव उत्पन्न करता है जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होते हैं। अतः यह परम्परा चली होगी। ये बात अलग है कि वर्तमान में इसका कोई विशेष लाभ दिखाई नही देता।

अंधविश्वास समाज में सदियों से चले आ रहे कुछ नियम भर हैं। इनमे से कुछ के पीछे वैज्ञानिक कारण हैं तो कुछ केवल अज्ञान पर ही आधारित हैं। जादू-टोना, गाँव में स्त्री को डायन घोषित कर देना अथवा मंदिरों में वर्ग विशेष के जाने पर प्रतिबंध जैसे नियम केवल अज्ञान के परिचायक हैं और कुछ नहीं। समय आ गया है कि प्रचलित परम्पराओं को तर्क की कसौटी पर कसकर देखा जाए । वे लाभ की दिशा में हैं तो अपना लिया जाए, अन्यथा इन नियमों को जड़ से उखाड़कर फेंक दिया जाए।

— मधु शर्मा कटिहा

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