मेरी किस्मत ठीक है

घर में सबलोगों के बीच बैठा बैठा ऊब गया था। सोचा बाज़ार ही घूम लिया जाए। इसी विचार से निकला और पहुँच गया बाज़ार। इतवार का दिन बाजार की गहमा गहमी ऐसे होती है, जैसे सरकार ने हर चीज़ मुफ्त बाँटने की मुनादी की हो। इधर उधर भटक ही रहा था कि कार्यालय के कुछ मित्रों की एक मंडली दिखी।
अरे! पाठक साहब इधर कैसे, नेगी जी देखते ही सवाल दागा। ये सवाल पूछते नहीं दागते हैं, जब तक सामने वाले इनके सवालों का जवाब देकर थक नहीं जाए पूछते रहते हैं,।

इच्छा तो मेरी भी हुई थोड़ा चल के दिखाऊँ और कह दूँ बस ऐसे … फिर सोचा हर वक़्त दिल्लगी ठीक नहीं।
– घर में बैठे बैठे ऊब गया था, सोचा थोड़ा सैर -सपाटा हो जाए।

– आइए फिर विकास बाबु के जन्मदिन की पार्टी में हमारे साथ। विकास इससे पहले की कुछ बोले, फिर नेगी जी बोले – क्यों विकास जी आपकी पार्टी और पाठक साहब न हो ऐसा हो सकता है क्या ?
बिलकुल भी नहीं हो सकता, पाठक सर आप बहुत दिनों से दिखे नहीं हैं। हमारे साथ आइए सर, सबको अच्छा लगेगा खासकर मुझे, विकास जी बोले ।

विकास जी, ओहदे में मुझसे कम नहीं और उम्र में भी समकक्ष ही होंगे, लेकिन शुरू से ही सर कहते हैं मना करने से कोई असर नहीं होता।

अब मैं भी पार्टी का हिस्सा बन गया था, नज़दीक के ही एक रेस्टॉरेन्ट में गए। सबने अपने अपने पसंद के व्यंजन मंगवाए। मेरी तबीयत ठीक तो थी नहीं, फिर भी थोड़ा थोड़ा स्वाद सबका चख ही लिया। बिल देने की बारी आई तो मैंने काफ़ी आग्रह किया कि मुझे भी बिल देने में अपना सहयोगी बनाएं। अपना बटुआ और मोबाइल दोनों खाने के टेबल पर रखा। लेकिन एक न चली विकास जी की जन्मदिन की पार्टी थी आखिर, उन्होंने ही भुगतान किया। फिर निकल लिए सब अपने अपने रास्ते।

मैं भी अपने घर पहूँचा, कुछ वक़्त आराम किया ऊब तो कम हो गई थी लेकिन थकान हो गई थी। बीमार होने पर शरीर जल्दी थक जाता है। उसी वक़्त याद आया, जन्मदिन की दावत तो उड़ा आया लेकिन, विकास जी को बधाई तो दिया ही नहीं। अपनी बेवकूफी को सोचते हुए अपना मोबाइल फोन ढूढंने लगा। सोचा मोबाइल में ही बधाई दे दूं देरी से ही परंतु दिन तो नहीं बदलेगा।
कमबख्त यह फोन भी अक्सर ही लुका छिपी का खेल खेला करता है ।
अब जाने कहां छुप गया है
शायद! पैंट की जेब में होगा।
अरे! यहाँ भी नहीं, तभी ध्यान आया कहीं ….

अपना जेब देखा बटुआ भी नदारद। पक्का, रेस्टॉरेन्ट में मेज़ पर भूल आया हूँ। बिना किसी से घर में कुछ कहे निकल गया मार्केट की तरफ।गाड़ी लिया तो घर में सबको मालूम चल जाएगा, फिर बेवजह बखेड़ा होगा। पैदल जल्दी पहुँचने के लिए, दूसरा रास्ता पकड़ा । कच्ची सड़क है, परन्तु 20 मिनट में पहुँच जाऊंगा।
भागता जा रहा हूँ, सोचता जा रहा हूँ …
– 1 घण्टा हो गया है… कोई ले तो नहीं गया होगा …
– नहीं! नहीं! अच्छे लोगों के साथ बुरा नहीं हो सकता है …
– अगर कोई ले गया हो तो …
– सारे क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड बटुए में हैं … माथे से पसीने टपकने लगे …
– नहीं नहीं, इतना आसान नहीं की पैसे चुरा लें …
– डेबिट कार्ड तो फिर भी ठीक है, लेकिन क्रेडिट कार्ड से ऑनलाइन खरीदारी कर सकते हैं … एक बार के लिए पासवर्ड ( OTP) भी तो मोबाइल पर आ जाता हैं।
– ऐसा तो जरूरी नहीं कि मोबाइल और बटुआ एक ही आदमी ने लिया हो।

इसी उधेड़बुन में पसीने से लथपथ दौड़ता जा रहा हूँ, साथ में प्रार्थना भी करता जा रहा हूं।
हे भगवान आप ही बचाओ … आप तो जानते हो सब मेहनत के पैसे है… अगर चोरी हो गए तो …

तभी विचार आया कि मोबाइल और कार्ड दोनों बंद करवा देता हूँ कुछ दिनों के लिए, दूसरा मंगवा लूँगा।
यही सोचकर मदद के लिए पास के ही एक किराने के दुकान में गया, सोचा वहां किसी से मोबाइल लेकर सहायता केंद्र में फोन करूंगा और मोबाइल नंबर बंद करवा दूंगा ।
लेकिन वहां एक काम करने वाला लड़का मिला। इसके पास मोबाइल तो है लेकिन उसमें सिर्फ ₹1 की धनराशि है।
सहायता केंद्र के नंबर अक्सर टोल फ्री अर्थात निशुल्क होते हैं, यही सोचकर मैंने उससे मोबाइल तो लिया लेकिन
परेशानी के मारे, मुझे सहायता केंद्र का फोन नंबर ही याद नहीं आ रहा । किसी दोस्त को फ़ोन करके पूछ भी नहीं सकता। ₹1 का बैलेंस है जो मैं उसका खत्म नहीं करना चाहता।
पसीने से तरबतर अपनी किस्मत पर भरोसा करते हुए, मैं उस दुकान से बाहर निकला और वापस मार्केट की तरफ भागना शुरु किया।
मैं पूरी तरह थक चुका हूं, मुझसे भागा भी नहीं जा रहा।
किसी तरह लड़खड़ाता हुआ तेज तेज चलने की कोशिश कर रहा हूं।

तभी … टी टी टी ….टी टी …

मोबाइल बजा और मेरी नींद खुल गई।
मुझे ज्ञात हुआ मैं सपने में था।
मेरा कुछ भी नहीं खोया।
मेरी किस्मत ठीक है।
– – कमल

No votes yet.
Please wait...

Leave a Reply

Close Menu