सरेआम

 

सरेआम अपने इश्क  का यूँ न तमाशा  बनाइये।

अपने वजूद का खुद ही ज़रा पता लगाइये।।

बेमौत मार डालेंगी हमे ये होशमंदियाँ ।

गर जीने की आरजू है तो खुद को भुला जाइये।

क़ाफी है दर्द-ए-गम के लिए इक खोखली हँसी।

ये कौन सी तरकीब है और इन्हे क्या चाहिये।।

इस कदर है मेरे लिए पाबंदी-ए-इश्क।

अब मेरे अक्स को न आईना दिखाइये।।

तमाम उम्र तरसता रहा इक हँसी के लिए।

गर आना मेरे जनाजे मे तो हँसा के जाइये।। ■

– अनूप दीक्षित “ तन्हा

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