गांव एक स्वर्ग

रीवा शहर के उत्तर दिशा में लगभग पन्द्रह मील दूर जवा बाजार है। जवा से करीब आधे कोश में गौहाना गांव है। गांव काहे का पूरा स्वर्ग। काफी बड़ा गांव, ढ़ाई सौ घर की बस्ती। बढ़िया आम का सुन्दर बगीचा, गेहॅू, धान , तुअर की फसल हेतु उपयुक्त मिट्टीयॉ। एक तालाब, पानी से लबालब भरा। गांव के कुछ दूरी पर एक गौषाला। जो ढ़ाई सौ वर्शां पुराना था। जिसका निर्माण सितलहा के राजा व्दारा कराया था। यह गौषाला अब गिर चुका है। कुछ अवषेश बचे हैं जिसे किसान-मज़दूर दोनों वर्गो के लोग मिटाने पर तुले हुये हैं।

गांव के बाहर से कुछ दूरी पर मोहरा नहर निकली हुई है। जिसमें पानी वर्षों से नहीं आया। बचपन में बच्चों का प्रायः नहर ही तैराकी का साधन हुआ करती थी। किन्तु परिस्थियां अब बदल चुकी हैं। एक थे लालबहादुर साहब। अपने जमाने के मशहूर इलाकेदार। आठ-आठ जोड़े के नारियां खेत में चलती थीं। बैलों के लिए अलग से नाद गड़ी , भूसा खरी बाटभर भरा रहता। बारह मूड़ा गाय, छः-सात लगता, बाकी गाभिन, लगताए भादौ………..

लालबहादुर साहब के तीन पुत्र थे, बड़ा लड़का हेतलाल। उसके सेखिया 14 वर्ष, रनिया 12 वर्ष की सुन्दर दो पुत्रियां थीं। दूसरा लड़का भोलेनाथ शादीशुदा होते हुये भी पत्नि से अच्छे सम्बन्ध नहीं। तीसरा लड़का गोकुल प्रसाद अभी अविवाहित, उम्र लगभग 26 वर्ष। कड़क मिजाज, अड़ियाल स्वभाव, मृदुभाशी होने के कारण गांव भर में अच्छी खासी इज्जत पा रखी है। सुबह होते ही सभी लोग अपने-अपने काम पर जा रहे थे।

इतने में रनिया आकर बोली-‘ कक्का, बधाव बजबाई। ’भोलेनाथ- बधाव ! का भा ?

रनिया – अरे, तिलरी गाय के एक्ठे निकही रकेरूया भै हय।

भोले – कब ?

रनिया – रात मा। अब चली, जल्दी उठी, सब लोग काम पर चले गै हां। जई आमा के टेरी टोर लयअई। चूनी चोकरा ……….। अउर हा जादा खाय का कुछ न दीन्हे, नहीं ता ………..। हम जई थी दिद्दा के लगे।

भोलेनाथ – चला, एक्ठो अउर झंझट आय गै। जाय का ता परवै का परी।

यह वही गांव है जहॉ गौषाला बड़े धूम-धाम से राजा ने बनवाया था। कई वर्शों तक काफी ज्यादा संख्या में गायें यहां थीं किन्तु धीरे-धीरे गाय लालबहादुर साहब के यहां ही

बची। अब इनके यहॉ की भी स्थिति ठीक नही।

गोकुल- मैं मानता हॅू कि दश विकासषील से विकसित की ओर कदम बढ़ रहा है किन्तु वह और समस्याओं में उलझता जा रहा है। भोले भईया आप ही बताइये, आज से करीब बीस वर्ष पहले गांव की क्या स्थिति थी ? और आज क्या है ?

भोले – छोड़ ना यार, इ जउन तै सोचते हय, अब इया कोहू नही करै का चाहे।

गोकुल – तो ! क्या आप भी ?

भोले – अरे ! हम ता बाबू अउर इया गिरस्ती चलावै के खातिर भाईया केर ओरा करित हयेन , नही ता………………।

सेखिया – अरे , आप लोग अभी तक यहीं बैठे हैं, मुझे भी विद्यालय जाना है। चलकर खाना खा लिजिए।

‘ठीक है।’ दोनों ने प्रतिउत्तर दिया। फिर दोनों भाई आपस में बात करने लगे। आवाज सुन इतने में लालबहादुर, हेतलाल भी अपने पत्नी के साथ आकर गोकुल और भोले के  चौपाल में शामिल हो गये। ‘सेखिया भी कितनी हो रही है। दो-तीन तो गाय ही बचीं।

खेती भी ठीक से नही रही। ऐसे में विवाह करना बदनामी नहीं तो और क्या होगा भोले भाइया?’ गोकुल ने चिन्ता व्यक्त करते हुये इच्छा की।

भोले -‘इया गाय-गउरईया अउर खेती-किसानी से कुछू न होई। हम त कही थे के  शहर चला। हूआ काम-धन्धा कुछु त मिलिन जई।’

आज खेती-किसानी कोई नही करना चाहता। सब अराम की जिन्दगी जीना चाहते हैं, जैसे भोलेनाथ। इन जैसे लोगों की न जाने लाखों-लाख में संख्या होगी। ये खेती को अभिशाप  समझते हैं। कुछ तो खाद-बीज, पानी और बिजली के महगाई से परेशान  और कुछ भारी भरकम पैसा लगाकर उसमें लाभ न पाने के ड़र से, तो कुछ सरकार के  उदासीनता की वजह से खेती नही करना चाहते। जो अभी कर रहे हैं, भगवान भरोसे।  अगर इनकी संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई तो जीवन जीना कैसे संभव होगा ? शादी  करना तो भोलेनाथ चाहता है किन्तु माध्यम दूसरा। आखिर देश की जनता को हो क्या गया है ? सरकार , सरकार का तो कहना ही क्या………..। जो हजारों टन अन्न रखे- रखे सड़ जाता है और उसकी नीति धूल-धूसरित हो जाती है। मैं सरकारों से क्षमा चाहॅूगा,  मेरा मकसद किसी की भावनाओं को आहत करना नही है। आखिर किसान खेती क्यों  नही करना चाहता ? चिन्तन करना सरकार का कर्त्तव्य है, उसका दात्यित्व है। गोकुल चाहता तो भोले को जबाव दे-देता।

वह इतना ही कहा-‘सभी जरूरतें पैसों से पूरी नही होती।’ कहकर चुप हो गया। हेतलाल ने कहा-‘ तुम लोग अपनी-अपनी जगह सही हो। किन्तु यह जान लो की सभी समस्याओं का समाधान शहर में नही हो सकता।’ हेतलाल यह कहना चाह रहे थे कि मानव जीवन के लिये अन्न की आवष्यकता होती है और अन्न शहर में नही गावों में ही पैदा होता है।

भोले -‘ काहे न होई ? हूआ काम मिलिजई, पैसा आ जई फेर उ कहनूत त सुनने होब ‘‘दादू बड़ा न भइया, सबसे बड़ा रूपइया’’ रूपिया मा त सब मिलि जई।’ बीच में ही लालबहादूर साहब बोले-‘देखो बेटा, माता की ममता, पिता का स्नेह, भाई-बहन का प्यार और गांव में गलती पर माफी यह शहर में न मिलेगी।’ हेतलाल भोलेनाथ के धूतर्ता पर तरस खाते हुये-‘किसी के दुःख में मुहल्ले भर के लोगों की सांत्वना, गर्मी के चिलचिलाते धूप में प्यासे मुसाफिर के पास अगर पैसे नही हैं तो पानी, राह चलते को अगर कोई वाहन कुचल दिया तो कोई उठाने वाला नही मिलेगा और हां, शहर में कोई निःसन्तान बूढ़ा व्यक्ति मर जाये तो कोई उसका दाह-संस्कार करने वाला नही मिलेगा।

तुम उस शहर की बात करते हो जहॉ मानव को मानव न मानकर जानवर मानते हैं। मैनें अपने आखों से देखा है उन गरीबों को जो तुम्हारे ही जैसे सपने पाले शहर जाते हैं और रिक्सा चलाने को मजबूर हो जाते हैं। उतने पर भी खाने के लाले पड़ जाते हैं तो बरात घर में पेट की आग बुझाने जाते हैं किन्तु पकड़े जाने पर उनका क्या हाल होता है यह न पूछो। और हां, पैसा वाला व्यक्ति पैसे वाले को ही पहचानेगा, बाकी का हाल मत पूछो …………..।’

भोलेनाथ -‘ ठीक है, पर कुछु त करेन परी।’

हेतलाल – ‘करो भाई, मेरे साथ जैसे काम करते आये हो वैसे ही करो। किसानी करो,

गाय-भैंस पालो और मेहनत करो।’ यही स्वर्ग है।’

गोकुल – ‘दो साल अच्छे मन से हो जाये खेती। फिर सेखिया की शादी तो क्या रनिया की भी साथ-साथ कर लेना।’

भोले – ‘अच्छा। ’

इतने में सेखिया की मां ने कहा – देवर जी, आपकी कब होगी। ■

 

– उमेश दास

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