हिसाब आँखों से दिखाना पडा़

लिख लिख कर हिसाब आँखों से दिखाना पडा़।

कमबख्त ना चाह कर भी दुष्मनी निभाना पड़ा।

लब्ज तीर से निकले थे दिल को भेदने के लिऐ

जमाने के लिऐ हमे हर लब्ज सजाना पडा़।

कष्तीयों से पूछकर रस्ता सिकंदर ढूँढ लाया था

मगर उस रस्ते पे हमे अकेले ही जाना पडा़।

किस्मतो को कोसते रहने का किस्सा बहुत देखा

बाजी हारती हुई भी जीतकर दिखाना पड़ा।

जगे न रातभर जो जुगनू अंधेरो के डर से

दिये से रौषनी लेकर उन्हे रस्ता दिखाना पडा़।

बड़े हमदर्द हकीमों से हमने कह दिया सब कुछ

मगर दर्द आषिकी का आईनों से छिपाना पड़ा।

बहुत से “राज“ मिलते होगें किताबों मे

मुझ सा ना मिलेगा “राज“ उसको बताना पड़ा। ■

— ऋशभ पाण्डेय “राज “

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