“काँटा भी , बँटवारा भी”

बचपन की मासूमियत जहाँ खुद के होने का वजूद ही नहीं, फिर भी खुशगवार थी जिंदगी. कितने थप्पड़ माँ बाप से खाये ,रो लिए और फिर वही मासूम सी शैतानियां. मुझे आज भी याद है मेरा बचपन जो मैं ने कश्मीर में गुजारे थे. पड़ोस में मनहास अंकल का घर, एक ही दीवार, थोड़ी कच्ची-पक्की. कच्ची -पक्की इस लिए की उस दीवार में एक दरार आई हुई थी और ये दरार मनहास साहब की दो बेटियां और हमारे बीच संवाद का काम भी कर जाती. खेलने का समय कभी- कभी इसी माध्यम से तय हो जाता और कभी हमारी चोरी पकड़ी जाती. सामने हाजी साहब का घर जिसमें कई रिश्तेदारियां बसती थीं. उनके घर कई मुर्गे और मुर्गियां पलते. ये मुर्गियाँ हमारे ही आँगन में विचरण करती थी. चूँकि बाबूजी का आवासीय ऑफिस था  तो एक बड़ा हिस्सा ऐसा था जिसमे चेरी, अखरोट, खुबानी इत्यादि के अनेकों पेड़ बागीचे के तौर पर थे और एक बड़ा हिस्सा क्रीड़ास्थल के लिए था.
हालांकि हम छोटे तो  थे पर बहुत कुछ शैतानियां उस ऑफिस के कार्यरत नवयुवकों से ही सीखी थी. ये जो पड़ोसियों की मुर्गियां विचरती तो कुछ ये युवक शैतानी के तौर पर दाना का प्रलोभन मुर्गीयों को दिखाते अपने आँगन में ले आते और फिर जो जान बूझ की उक्साई लड़ाई का हम लुत्फ़ उठाते उसका मज़ा ही कुछ और था.
पड़ोस में एक सरदार का भी परिवार था, जिसमें चार भाई ही थे _ कुग्गे, पम्मे, राजू….  दो भाई तो हमसे बड़े और दो हमारे ही जैसे, कितना ख़याल करते थे हमारा, कहीं किसी से बाता-बाती हुई और ये चारों दोस्तों की तरफदारी बिलकुल ‘सरदारों वाली बात’ के साथ खड़े हो जाते. कैसे एक बार अनुराधा को जोर से पाँवों में काँटा चुभा था और कुग्गे-पम्मे ने पूरी तीमारदारी ही कर डाली.
सामने हाजी साहब का घर, अक्सर त्योहारों सा माहौल. ईद-बकरीद के अलावा कभी शादी तो कभी जनमोत्स्व तो कभी कुछ. अक्सरहा दावतों का दौर चलते रहता. कितनी दफे ऐसा भी कि खाने में मेनू हमारे तौर का ना हुआ तो कच्चे अन्न ही हमें भेज दिया जाता.
तीन तरफ से हम अपने पड़ोसियों से जुड़े और घर के सामने से होकर झेलम नदी बहती थी जहां पांच बार के नमाज़ और जुम्मे वाली नमाज़ की तो जैसे हमें आदत ही हो गई थी. सामने मुख्य स्टेडियम जहाँ हमेशा अनेकों जलसे और खेल हुआ करते.अनन्तनाग का वो इलाका हालांकि छोटा तो बहुत था पर राजनीतिक सरगर्मियाँ काफी सक्रिय थीं. हर कोई एक-दूसरे को जानता – पहचानता था. इतने छोटे भी थे तो भी कभी किसी बात का खौफ ना था, ना ही चोरी -डकैती का डर और ना ही किसी भी बात का कहर. तो फिर आज ऐसा क्या हुआ कि बात मारने मिटाने की हो गई. जिन घरों में हमने कितने प्यारे-प्यारे लम्हे गुजारे , उन घरों की हवाएं बदल गईं ऐसा कभी ख्यालों में भी नहीं आता. आज वो पाँव में काँटों की चुभन में प्यार ही याद आता है ,रिश्तों में ऐसे काँटे होंगे इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल. जहां लड़ाइयां होती थीं हाँ मुर्गियां चुराने को लेकर तब भी कोई दरो-दीवार खड़े करने की बात नहीं सोची, बीच घरों की दीवारों में दरारें थीं पर घरों में राज़ की बात हो और दीवारें भरने की नौबत आ जाए ऐसा भी नहीं, और आज ये हालात लाहॉल बिला कूवत! इतने सालों बाद भी वो स्कूल जिसमे दाखिला बच्चों का होना ही शान की बात थी , “hanfiya islamia college ” जिसमें हम बहनों ने भी तालीम पाई थी, जिसका अपना एक इतिहास था ,आज उसे जल के ख़ाक होना पड़ा. इससे पीड़ादाई और इंतिहाई बात , और क्या हो सकती? परेशानियां और दुश्वारियाँ तो हर प्रदेश और कौम की होती है , इसका क्या मतलब कि खून-खराबा और  तक्सीमियत(partition) ही हल निकले. आज मेरी भावनाएँ ज्वार भाटा की  वेग में है जहाँ बचपन की यादें अब भी जीवन के विभिन्न दहलीजों को ना पार करना चाहती है और ना बूढी होना चाहती है.
बस काँटों की चुभन भी वही जो प्यारे पलों को याद करा जाए, ऐ वक्त ! बस रुक जा तूँ बस यहीं.

– अपर्णा झा

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