किसने किया श्रृंगार

किसने किया श्रृंगार प्रकृति का,

अरे, कोई तो बतलाओ !

डाल-डाल पर फूल खिले हैं

ठण्डी सिहरन देती वात

पात गा रहे गीत व कविता

कितने सुहाने दिनऔर रात

मादकता मौसम में कैसी ,

अरे कोई तो समझाओ !

खेत-खेत में बिखरा सोना

कौन लुटाये बन दातार

रसबन्ती गुणबन्ती देखो

धरा करे किसकी मनुहार

रंग-महल सी बनी झोपड़ी,

कारण कैसा , समझाओ !

स्वागत में किसके ये मन

खड़ा हुआ है बन के प्रहरी

उजड़ा-उजड़ा सँवरा फिर से

बात समझ ना आये गहरी

मेरे मन की , तेरे मन की,

गुत्थी अब तो सुलझाओ !

भ्रमरों का मधुरिम गुंजन

और तितली का मँडराना

चप्पा-चप्पा बरसे अमृत,

नहीं कोई भी बिसराना

आया हैं ’ऋतुराज’ आज अब

स्वागत में कुछ तो गाओ

अरे कोई तो बतलाओ ■

– विश्वम्भर पाण्डेय ’व्यग्र’

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