दुआ

मालिक, मौला, खुदा, बाबा मेरे राम

कैसे पुकारूँ तुझे कितने सारे हैं नाम ?

सुनता है तो सुन ले , जरा इधर भी नज़रें लगा दें द्य

जहाँ से मिलती हो बोल के मेरे भी किस्मत माँगा दे

दर दर भटकता हूँ हर रोज, क्या तुझे नज़र आता है ?

हर दुसरे दिन बिखर के सवारतें ही फिर से बिखर जाता है

अब हर बात बोल के बताई तो क्या मज़ा बताने का ?

खुद को ही हलाल करे दूँ, आखिर क्या लेगा ये दौर हटाने का ?

थक गया हूँ पर धीमे नहीं हुआ हूँ, अब क्या रुक जाऊ तभी जानेगा

हर रोज तो गिरता है आकाष अब क्या बिफर जाऊ तभी मानेगा

करा दे सामना अब दिक्कतों का किस्मत से घमासान छा जाने दे,

कर दे करम, बना दे लकीर किस्मत की, अब तूफ़ान आ जाने दे ■

– आकाश पाण्डेय

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