आज का इंसान

हर गली मे मंदिर और मस्जिद है
फ़िर इतना अधर्म पनपता क्यूँ है
जब खुदा से इत्ती ही मोहब्बत है
इंसान आपस मे  झगड़ता क्यूँ है

कहते हैं, खुदा सबके अंदर बसा है
औरों को देख़, मुँह फुलाता  क्यूँ है
खुदा और भगवान मे  कोई होड़ है  क्या
एक दूजे के अनुयायी को, दौड़ाता क्यूँ है

जिसने  बनाई दुनिया,  क्या वो  रिश्व़त लेगा
सोने का हार, चाँदी की पायल, चढ़ाता क्यूँ है
किसने कहा, उसकोे दिखावा पसंद आता है
भस्म, चंदन, इत्र, सूरमा, अबीर, लगाता क्यूँ है

जिस माँ-बाप ने  तुझे जीवन दिया है
उसको ही, जिंदगी से, ड़राता  क्यूँ है
आपकी बहू, किसी की बेटी ही तो है
आग की भेंट उसको, चढ़ाता  क्यूँ है

जीने के लिए दो रोटी ही तो चाहिए
पैसों के पीछे खुद को,धकेलता क्यूँ है
सब यहीं धरा रह जाना है एक दिन
इतना गबन-घोटाला, करता  क्यूँ है

लड़खड़ातों  को  सहारा  नहीं देना था  जब
बोतल की आखरी बूंद तक, पिलाता क्यूँ है
जब पीठ मे खंजर घोपना ही रहता है
अपना बनाकर, गले  लगाता  क्यूँ  है

बीमारियों की जड़  गलत खान-पान है
रसना को भाये, ऐसा अन्न खाता क्यूँ है
दालान तक तो किसी का बना नहीं सकता
फ़िर बना-बनाया मकान, ढ़हाता क्यूँ है

जिंदा इंसानों को कोई पूछता तक नहीं
मोम के  पुतले बनाकर, सजाता क्यूँ है
समय  के  साथ  परिवर्तन  लाज़मी  है
खोख़ली मान्यताओं को, मानता क्यूँ है

पालन-पोषण करने को और भी चीजे हैं
दुश्मनी का बीज दिल मे, पालता  क्यूँ है
हार-जीत लगी रहती है जिंदगानी के खेल मे
फैसलों को लेकर  इतना घबराता क्यूँ है

हर रिश्ते मे खुदा की  छाप है, रज़ा है
इंसा रिश्ते को निचोड़ता-मरोड़ता क्यूँ है
जिंदगी की  नेमत  मिली है  एक  बार
बस इत्ती सी बात को झुठलाता क्यूँ है

— मनीष सिंह “वंदन”

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