छोटी चिड़िया

मेरे घर की छोटी चिडिया.
कहते हैँ जिसको गौरैय्या,
आज शाम वह छत पर बैठी
कहती सुन लो मेरे भैया ।

घर तो तुमने खूब बनाया.
जर्रा जर्रा इसे सजाया.
लेकिन मेरी क्या गलती थी
जो घर से तुमने मुझे भगाया।

कंक्रीट से घर बनवाया
छप्पर कोई नही छवाया .
खेतो मे कीटनाशी छिडका.
फलवाला ना पेड लगाया।

जिससे मुझको भोजन मिलता.
छाया मिलती औ सुख मिलता.
आसपास कुछ कीड़े मिलते
जिससे मेरा भी दिल खिलता।

किन्तु हाय वह रिश्ता टूटा.
मेरा पैतृक निवास अब छूटा.
खाली पेट नही है दाना
आँखो से लो आँसू फूटा।

आँखो से जब आँसू फूटा.
मैने अपनी गलती मानी.
उसे सुधारने की फिर ठानी.
कही नही अब जाओगी तुम,
मेरी प्यारी चिड़िया रानी।

मै अब सबकुछ ध्यान रखूँगा.
कुछ तो तेरे लियेकरूँगा ,
गेहूँ चावल के कुछ दाने
औ पानी भी छत पर रखूँगा।

हरे भरे पेड़ो से
अब घर मेरा घिरा रहेगा ,
छप्पर जैसा छज्जोँ पर
कुछ पुआल अब धरा रहेगा।

जिसमे तुम घोँसला बनाना.
रहना सुख से आनन्द मनाना.
मुझको भी प्रसन्नता होगी.
देख तुम्हारा नीड़ बनाना।

और तुम्हारा नीड़ बनाना
बच्चोँ को दिखलाऊँगा.
फिर से ऐसा वक्त न आये
उनको यह सिखलाऊँगा।

— आशीष पाण्डेय

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