मोहन जोदडो

इस विशय में हम जितना भी जानते हैं, ये सभ्यता उससे भी कहीं आगे थी कहीं अधिक विकसित और सभ्य एवं सुसंस्कृत थी . इनका जीवन गरिमापूर्ण, सौहाद्रपूर्ण और प्रेमवत  था, इनमे युद्ध आदि के प्रमाण नहीं मिलते, इनके हथियार, हथियार से कहीं अधिक औजारों की तरह पाए गए हैं . उनके आदर्ष उनके धर्म एवं उनकी विषेशताएं, उपलब्धियां विश्वसनीय एवं हैरत में डाल देने वाली थीलगभग 13 लाख वर्ग किलोमीटर, कष्मीर से नर्मदा नदी और पाकिस्तान के बलूचिस्तान से उत्तरप्रदेष का मेरठ तक इनकी मौजूदगी के प्रमाण तो प्राप्त हो ही चुके हैं | इस आधार पर समकालीन सभ्यताओं में इस सभ्यता की विषालता के समकक्ष कोई नहीं रहा हो इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है, इससे भी बड़ी हैरत ये कि वर्तमान शोध  ( मई – जून 2016) बताते हैं है की ये सभ्यता जिसे अभी तक ५ हज़ार वर्ष  पुराना मन जाता रहा किन्तु असल में ये सभ्यता ८ हज़ार वर्ष पुरानी  है . ये कोई छोटी उपलब्धि नहीं ये बात यदि सत्य हुई तो भारत की प्राचीन सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं मिस्र और मेसोपोटामिया को भी पीछे छोड़ देगी . सिन्धु दम्भ्यता विश्व की सबसे पुराणी और सबसे विकसित तकनिकी और कला में प्रथम संपन्न सभ्यता में सुमार होगी . नए षोध से ये बात भी साबित करते हैं इ सिन्धु सभ्यता जिसे भारत की पहली सभ्यता माना जाता रहा है असल में इससे पूर्व भी एक हज़ार वर्श तक अस्तित्व में रहनेवाली एक अन्य भारतीय प्राचीनतम सभ्यताओं में से दूसरी है अर्थात इस सभ्यता से पूर्व एक हज़ार वर्श तक एक अन्य सभ्यता का उद्भव और पतन हो चूका है .

अब जबकि सिन्धु सभ्यता के तकनीक और कला का समकालीन मिश्रा और मेसोपोटामिया से कोई मुकाबला नहीं था ऐसे में इस वैभव की प्राचीनता की जड़ें और भीतर सभ्यताओं के कई राज दफ़न किये हुए हैं . इस बात को एक उदहारण से समझे की जब अन्य समकालीन सभ्यता मिस्र और मेसोपोटामियाके लोग पक्की इंटों से परिचित भी नहीं थे ऐसे में सिन्धु सभ्यता में पक्की इंटों की बहुमंजलीय इमारतें देखने को मिलती हैं . सर्वमान्य तथ्य ये भी की ये लोग भौतिक सुख सुविधाओं, व्यापार, वणिज्य प्रधान लोग हिंसा मार -पीट युद्ध को कोई स्थान नहीं देते थे . ये षान्ति प्रिय लोग, सभ्य सुसंस्कृत लोग थे . प्राचीन काल में आज से पांच हज़ार यदि नविन षोधों को मानें तो ८ हज़ार वर्श पूर्व के मानव समाज से षांतिप्रियता की अपेक्षा करना कितना न्यायपूर्ण होगा जबकि हम बाद के इतिहासों मध्यकाल और आधुनिक काल में भी युद्धों, संघर्शों का विस्तृत उल्लेख पाते हैं ऐसे में हम देखते हैं वर्तन २१वीं सदी के आधुनिक कही जाने वाले लोगों की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक समस्या आतंक से उपजी हुई हिंसा ही है .हिंसा समझ में फैले आक्रोष एवं असंतोश को ही व्यक्त करता है. इसमें तृण मात्र भी संदेह नहीं कि हिंसा समाज में व्याप्त अंसतोश को ही व्यक्त करती है और इसे षासन की विफलता के रूप में देखा जाना चाहिए . ऐसे में इस बात को यदि और आगे इस सभ्यता पर लागू कर दें . तो इन्होने वर्तमान सामाजिक ढांचे को भी चुनौती ही नहीं दी अपितु अपनी उत्कृश्टता भी साबित कर दी है . सही है की वश्वीकरण के आज के युग    समस्याओं की तुलना उस काल के मानव के से नहीं होना चाहिए किन्तु उपलब्धता बढ़ने से समस्याएं भी बढती हैं और उनके निवारण के साधन भी उसी अनुपात में बढ़ जाते हैं तो फिर सैन्धव समाज में चुनौतियाँ नहीं रही हो ऐसा नहीं माना जा सकता अपितु इन लोगों ने उन समस्याओं को सफलता पूर्वक हल कर रखा था, इसे स्वीकारना ही न्याय पूर्ण होगा .

बात हाल के ही मोहन जोदाडो फिल्म की बात करें तो एक पंक्ति में अपने भाव व्यक्त  करूँ तो इस फिल्मकार ने फिल्म में इस सभ्यता के साथ न्याय तो दूर की बात, इसका मान मर्दन ही कर डाला है और भी सत्य बोलकर .

कहा जा सकता है की इस सभयता के लोग कई विशयों में आज के समय से भी आगे थे और निष्चय ही यदि वे हमारी जगह आज २१वी सदी में होते हो अपनी प्राचीन गौरव की सभ्यता का ऐसा प्रस्तुतीकरण न करते …. जैसा फिल्मकार ने इस भारतीय वैभवपूर्ण  सभ्यता का प्रस्तुतीकरण कर झूठ का व्यापार खड़ा किया है . मैं यदि अपने विवेक से सैन्धव लोगों ले समाज में इस घटना को घटता देखूं तो सैन्धव समाज में इसे कभी माफ़ नहीं किया जाता ये बात उनकी षांतिप्रिय, ईमानदारी और नैतिक आदर्षों के दृश्टिकोण से प्रस्तुत कर रहा हूँ .

एक इतिहासकार के लिए इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है की जिस प्राचीन  मानव के विशय में वो खाक छान रहा वह जो वर्तमान मानव से भी कई विशयों में श्रेश्ठ थे, उसे बड़े परदे पर जीने, चित्रित होने की कल्पना से ही भाव विभोर हो जाता .

किन्तु ….

हाथ में तलवार लिए घोड़े पर स्वर हड़प्पाई युग का एक चरित्र ने परदे पर कत्लेआम मचा रखा है और कहता है जानो ये सच जो षायद कभी न जान सके हो .

ये तलवार, ये घोड़े, ये अस्त्र सस्त्र आये कहाँ से ? उन्हें घोड़े का ज्ञान नहीं था  और ये तलवार …कोई बड़ी बात नहीं …. बड़े बड़े द्विमंजलीय भवनों के निर्माण की कला जानने वाले लोगों एवं चिकित्सा पद्धति की षल्य चिकित्सा ( चीर – फाड़ ) को विकसित कर चुके लोगों के लिए एक बात रही होगी किन्तु इन्होने अथवा इनके समाज ने ऐसी किसी भी वस्तु को कोई भी स्थान नहीं दिया था .

फिल्मकार इस कथा को हिंसक पट पर प्रस्तुत कर क्या वर्तमान हिंसक सोच को इतिहास पर लादना चाह रहे हैं ?

सिन्धु लोगों की अद्वितीय विषेशता ही यही थी की गाँधी, बुद्ध की पर अहिंसा को जीने वाले ये लोग मानव इतिहास के प्रारंभ में ही इसका प्रयोग कर चुके थे . अद्भुत ,अविश्वसनीय, अकल्पनीय और उससे भी अधिक वीभत्स चित्रण जो परदे पर घट रही थी .

किसी ऐतिहासिक चरित्र से न्याय करने की अपेक्षा नहीं करता किन्तु उसे छिन्न भिन्न कर देने का समर्थन भी कैसे करूँ ?

हड्प्पाई प्रारंभ से ही अपनी अहिंसक नीतियों के कारण अन्याय झेलते आये हैं और वो क्रम आज भी सतत जीवित हो चला है . मनोरंजन से किसी का भी बैर नहीं किन्तुइसके लिए किसी ऐतिहासिक चरित्र का मान मर्दन तो न किया जाय, कदाचित ये कोई अपराध नहीं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही हिस्सा है कहीं संविधान में लिखा थोड़े ही है ऐतिहासिक चरित्र के साथ न्याय हो अथवा भारत भूमि की जय जयकार हो … हाँ उसे संजोये रखने, सम्मान देने का उल्लेख मौलिक कर्तव्यों में अवश्यहै किन्तु बाध्यकारी नहीं की इसे व्यापार बना लाभ न कमाया जा सके .

खैर इस स्थिति के मद्देनज़र बात को और न खीचते हुए शांत हो कर मनोरंजन के लिए टिकट के रूप में खर्चे रूपये की सार्थकता को अर्थपूर्ण बनाने का यत्न किया जाए अथवा पश्चताप पर विचार ? ■

— – मृदुल श्रीवास्तव

No votes yet.
Please wait...

Leave a Reply

Close Menu