बरसो से प्यासा मेरा मन कह रहा है

न वो कुछ कह रही है,

न मैं कुछ कह रहा हूँ

जमीं कह रही है,गगन कह रहा है,

महका हुआ ये चमन कह रहा है,

भँवरों मे उलझी कली है वो शायद

बरसो से प्यासा मेरा मन कह रहा है।

न वो कुछ कह रही है, न मै कुछ कह रहा हूँ।

मेरे पास बैठी वो रह रह कर मुस्कुराती है,

उसकी भोली आँखें मुझे परियों का दर्श कराती हैं,

कुछ अनदेखा सा रूप है उसका,

फूलों का उसका बदन कह रहा है।।

न वो कुछ कह रही है, न मै कुछ कह रहा हूँ।

अपने आचरण से वो मर्यादा दिखाये,

सलीके से अपने वो सौम्यता सिखाये,

कुछ विशेष आकर्षण हो उसमें,

अपने मे डूबा ये मगन कह रहा है।।

न वो कुछ कह रही है,

न मैं कुछ कह रहा हूँ।।

— अवनीन्द्र बिस्मिल

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