वह दिन आएगा

आज सशंकित है नारी,
ना जाने कल क्या होगा?
फूल चढाए जिसको उस,
माँ की कोख का क्या होगा?

वर्चस्व की कीमत पर क्या फिर,
किसी अबला का शीलभंग होगा?
या कि मोहन पासे की दावों पर,
फिर देख द्रौपदी, दंग होगा?

शायद इस घृणित कृत्य से तुम,
विजय दम्भ से भर जाओ।
जड को खंडित करके चाहे तुम,
इस वट को वश मे कर पाओ।

पर क्या उस वट की सुधातुल्य,
शीतलता को फिर ले पाएगा।
तेरा सृजन किया जिसने, उसको,
तू क्या मुँह दिखलाएगा।

जब माँ तुझपर शर्मिन्दा होगी,
बहन सहम सी जाएगी।
जब तेरी आँखों में पुरुषों की,
ढोंगी सच्चाई पाएगी।

ब बिटिया पापा की गोदी मे,
खुद को असहज पाएगी।
क्या तब भी तेरी वामांगी,
तुझपर उतना ही इतराएगी?

पर पता नहीं क्यों मन मेरा,
बार-बार ये कहता है।
है साक्षी इतिहास कि तम,
प्रात: तक ही रहता है।

नव दिन के नव किरण पुँज से,
इस तम का पूर्ण अंत होगा।
नारी सदा सुरक्षित होगी,
यह धरा अभय अनंत होगा।

मै रहूँ ना रहूँ मगर धरा पर,
वह दिन निश्चय ही आएगा।
सचमुच वह दिन आएगा,
उस दिन को आना ही होगा।।

— सौरभ कुमार मिश्र ‘सतर्ष’

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