सफ़र आसमानो से जमीं तक का

बादलों की फ़रमाईश को आज हवन करते हैं
चलो आसमानों सेे ज़मीं तक का सफ़र करते है
इन अक्षरों के मेलों को कुछ दफ़न करते हैं
चलो आसमानों से ज़मीं तक का सफ़र करते हैं

बहुत हो लिए वाकिफ़ चाँद की तारिकाओं से
बहुत पिरो लिया ख़्वाबों को भी फ़िज़ाओं में
निर्जन सी पड़ी उस भू को आज चमन करते हैं
चलो आसमानों से ज़मीं तक का सफ़र करते हैं

बेहोशियत की आवाज़ों का समाँ क्या है
गगन की घटाओं से न पुछो धरा क्या है
इस भू से जिस्म की रुह का मिलन करते हैं
चलो आसमानों से ज़मीं तक का सफ़र करते हैं

मौत मेहमाँ है यकीनन कफ़न लाएेगी
खौफ़ की घड़ियाँ उसी वक़्त खतम हो जाऐंगी
क्षितिज के नेह को चुरा लेने का जतन करते हैं
चलो आसमानों से ज़मीं तक का सफ़र करते हैं

नहीं महक बाकी भोर की डालियों में
नहीं डगर बाकी प्रेम की प्यालियों में
फुट पड़े अंकुर पल्लवित नर हो जाएँ अब लगन करते हैं
चलो आसमानों से ज़मीं तक का सफ़र करते हैं
सृष्टि भार्गव

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