अपराधी कौन

जैसे-जैसे अँधेरा छँट रहा था तो सभी दिशाओं में ऐसा लग रहा था, जैसे कोई चित्रकार अपने चित्र पट के काले रंग को सफेद कर रहा हो। थोड़ी देर मे चिडियों की चहचहाट भी शुरू हो गई, पर उस चहचहाट मे अजीब सी शान्ति थी,एक अलग सा सम्मोहन था। पूर्व दिशा मे धीरे-धीरे लालिमा बढ रही थी और मुरझाई हुई कलियाँ उस विरह रात को भुलाकर अपने प्रिय के मिलन के लिए तैयार होने का प्रयास करती दिख रही थी। चारो तरफ के वातावरण मे हर तरफ ताजगी और प्रसन्नता है जैसे किसी के सुन्न हाथ की नाडियों मे अचानक रक्त का संचार होने लगा हो, किसी भूखे को कहीं से एक रोटी मिल गयी हो या किसी प्यासे को किसी मीठे कुँऐ का पता चल गया हो।।

लेकिन इतनी सुहावनी सुबह की वो रात कितनी मुश्किल से गुजरी पार्क की बेंच पर बैंठकर शायद वह यही सब सोंच रहा था। बेंच पर बैठे बैठे उसने सारी रात आँखों मे ही काट दी थी और जब उसने अपनी लाल आँखे खोली तब तक सामने सूरज भी अपनी लाल आँखें लिए पूर्व दिषा मे आ चुका था। उन दोनों की आँखों मे किसकी आँखें ज्यादा लाल थी ये बताना बहुत मुष्किल है। सूरज की तपिश जैसे जैसे बढ रही थी, उसकी आँखों की बेचैनी भी बढ रही थी क्योंकि थोड़ी देर मे पार्क मे भीड़ बढ जाऐगी और हो सकता है कि उनमें से कोई उसे पहचान ले। अपनी पहचान छिपाने का क्या कारण हो सकता है। वो तो अपने विद्यालय के योग्य छात्रों मे से एक था। हर कोई उसे पसंद करता था। कारण था कल आया हुआ उसका परीक्षा फल उसे बहुत कम अंक प्राप्त हुये। उसके माँ बाप को उसके 12वी के परीक्षा फल से बहुत उम्मीदे थी और जब उन्हें कम अंक आने की बात पता चली तो उनकी उम्मीदों को तगड़ा झटका लगा। अपनी उम्मीदों के तले दबे माँ बाप को,अपनी कुंठाओ से घिरे माँ बाप को जब उसका परीक्षा फल प्राप्त हुआ तब उन्होंने भाषा की समस्त सीमाएं लाँघ कर उस पर कटाक्ष किए। इसलिए उसे रात पार्क मे गुजारनी पडी। उसका नाम मनीष है। पिता का व्यवसाय था जिससे किसी प्रकार घर चल पाता था। वह अपने माँ बाप की उम्मीदों का एक मात्र सहारा था और होता भी कैसे नहीं वह अपने विद्यालय मे चोटी के छात्रों मे गिना जाता था। मनीष के सामने परेशानियाँ तब आई जब आठवीं पास करने के बाद दूसरे विद्यालय मे पढने आया। वह विद्यालय जिले के सबसे बेहतर विद्यालयों मे से एक था ऐसा उसने सबसे सुना था। इस विद्यालय मे मनीष की प्रतिभा को नया आकाश मिलेगा ऐसा भी सब कहते थे। पर नये विद्यालय का माहौल बिल्कुल अलग था। 50 बच्चों से भरी हर कक्षा और अध्यापक भी ऐसे जो मुँह से बात करने की जगह हाथ से बात करना ज्यादा पसंद करते थे। उसके गाल पर पडा हर एक तमाचा उसके आत्मविश्वास को झकझोर देता था। जब परीक्षा मे अंक कम आने लगे तब घर मे भी घमासान होने लगा।पहले उसे लगा वह अपने साथियों से कम योग्य है फिर उसे पता चला कि उसके सारे साथी कोंचिग संस्थानो मे भी पढाई करते हैं। उसके माँ बाप के कटाक्ष जहर बुझे तीर की तरह उसके दिल को चीर देते थे। हर पल गिरते आत्म विश्वास ने उसके दिमाग को जकड लिया। अपने अन्तर्मुखी स्वभाव के कारण उसने अपनी बात किसी से नही कही।चुपचाप सब कचछ सहता रहा और अवसाद का शिकार हो गया।

अब पार्क मे लोगों की भीड़ बढने लगी थी।तो वह घर जाने के लिए उठने लगा। बिखरे बाल,अस्त व्यस्त कपडे पागलो जैसे घर की तरफ चल दिया। रास्ते मे आने वाले हर एक दृश्य, हर एक कारनामे से निरपेक्ष था वह उसका किसी मे रस नहीं था न तो खिलती हँसती कलियो मे,न भँवरो की गुंजन मे,न तो मन्दिर मे होती आरती मे,न तो चंचल नयनो से देखती हुई आरती मे। जैसे वह रात की कालिमा मे निषेध रस का पान करके आया हो। घर पहुँचकर दरवाजा जैसे ही खोला अपने पिता की चिरपरिचित आवाज सुनाई दी, “आ गये,अरे मर क्यों नहीं गये। तुमने हमें कही मुँह दिखाने को नही छोडा। अगर अच्छे अंक आ जाते तो मुँह देखने के लिए लाईन लग जाती जैसे मनीश ने सोंचा।“ इतने कम अंक अब इन्जीनियर कैसे बनोगे।“ अब तो कभी कभी मनीश को लगता था कि साँस लेने के लेने के लिए भी इन्जीनियरिंग कालेज मे पढना जरूरी है।

रात मे माँ बाप ने सारी योजना बना ली थी, अब तक मनीश पर जो खर्च हुआ तो हुआ अब आगे नहीं अब वो खर्च खुद उठाये। आखिर कब तक माँ बाप एक नाकारा बेटे के बोझ उठायेउनके और भी तो बच्चे थे उनका भी तो ध्यान रखना था उन्हें।। कुछ दिनो बाद जब मनीश के दोस्त कालेज एडमिषन के लिए इधर उधर दौड़ रहे थे तब मनीष एक चाय के होटल मे चाय के गिलास लिए दौड़ रहा था। जो आसमान मे उडने के लिए पैदा हुआ था वो जमीन मे बैठकर झूठे गिलास धो रहा था। इसका जिम्मेदार कौन है समाज, परिवार, विद्यालय या स्वयं मनीष कोई भी पूरे आत्मविश्वास से नही कह सकता। ■

– अवनीन्द्र बिस्मिल

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