कैसी है ये पूजा श्रद्धा

विनय पहली बार अपनी  मम्मी के साथ मन्दिर जारहा था। रास्ते-भर माँ ने उसे अनेक उपदेश दिए कि हमें  हमेशा  गरीबों  की सेवा करनी चाहिए, जो दूसरों की सहायता  करते हैं भगवान उसे वरदान देते हैं,  हमें बडों की सेवा करनी चाहिये ,मन्दिर जाना चाहिये,भूखे को भोजन देना चाहिए, गरीब को सताना नहीं चाहिए।भगवान में  श्रद्धा होनी  चाहिये आदि -आदि।
चलते-चलते  रास्ते में  फलों की दुकान देखकर उस की मम्मी रुकी और मन्दिर में  भगवान को चढाने के लिए केलों का
मोल भाव करने लगी। फल वाले ने कहा, “माँ  जी,ये पांच रूपये के छ:और यह वाले दस रूपये के छ:।”   “पांच रूपये वाले दे दो” कहकर वे रुमाल में बँधे पैसे खोलने लगी । “पर माँ,  ये तो गले  और सड़े हुए हैं !”                    ” तो क्या हुआ, हमें  थोड़े  ही खाने हैं ?भगवान को ही तो चढाने हैं और भगवान जी भी  खाते थोड़े ही हैं।बस पूजा में श्रद्धा होनी  चाहिए बेटा!” विनय सोचने लगा…  कैसी है ये मम्मी  की पूजा- श्रद्धा ?”

— सुरेखा  शर्मा

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