तेरे शहर में ये पहर आख़री है

तेरे शहर में ये पहर आख़री है।
ये पहल, ये नजर, ये गजल आखरी है।

आ सको तो आ जाओ सारी उसूले तोड़ के,
दर्द-ए-दिल से भेजा ये ख़बर आखरी है।

मैं मर भी गया तो खुली रहेंगी आँखे,
तेरे दीदार के ख़ातिर, ये कसर आखरी है।

और क्या बताऊ बस इतना समझ लो,
मिलने की कोशिश, ये महज़ आखरी है।

किसी और का इंतजार ना होगा आँखों को कभी,
तू ही चाहत, मोहब्बत मेरी ग़रज आखरी है।।

— दीपू कुमार पाठक

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