सम्वेदनहीनता

आज़ बैंक में बहुत भीड़ थीएखैर इसके लिये हम बैंक वाले तैयार होकर आये थेएप्रधानमंत्री जी ने 500 व 1000 के नोट बंद किये थे । हम तैयार थे इस काले धन रूपी दैत्य को नष्ट करने के महायज्ञ में अपनी आहुति डालने के लिये । यथावत समय से कार्य शुरू हुआएधीरे धीरे लाइन कम होती जा रही थी । शाखा प्रबंधक महोदय ने ग्राहकों के लिये जलपान का प्रबंध किया हुआ था। सभी कार्य सुचारु रुप से चल रहा था कि तभी सीनियर सिटीज़न की लाइन में लगे एक बुजुर्ग के सीने में अचानक से दर्द उठा व वे अपने स्थान पर ही पछाड़ खा कर गिर गये । इससे पहले कि मैं केबिन से निकल कर बुज़ुर्गवार के पास पहुँच पाता अरोड़ा जी जो कि लाइन में काफ़ी आगे लगे हुए थे अपने स्थान छोड़कर बुज़ुर्गवार तक पहुँच गये व उनको उठा कर सोफे पर लिटाया तब तक मैंने एम्बुलेंस को फोन कर दिया था पर इससे पहले ही अरोड़ा जी ने बुज़ुर्गवार को अपने ड्राइवर के साथ निकटतम अस्पताल में भेज दिया और चुपचाप जाकर लाइन में अपने स्थान पर लग गये ।
मुझे कुछ दिन पहले का वाक्या याद हो आयाएजब एक अन्य ग्राहक का हल्कासा धक्का लगने पर अरोड़ा जी ने तुरंत उसको थप्पड़ जड़ दिया था व अच्छा खासा हंगामा खड़ा कर दिया था । मुझे यकीन नहीं हुआ कि यह वही इंसान हैएफ़िर लगा शायद वो पैसों की तपिश रही होगी स दौलत ही इंसान को भावशून्य व सम्वेदना से कोरा कर देती है इंसान भूल जाता है कि अन्तोगत्वा वह है तो इंसान ही व इस जीवन की अंतिम परिणिति पर इंसान को अकेला ही बिना किसी साजसंवार के जाना है । यह सम्वेदनहीनता शाश्वत एकाकीपन की जननी है व समाज के लिये विस्फोटक है ।

अंकुर मिश्रा

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