कन्यादान का अनुभव

इक्कीस अक्टूबर दो हजार की
सुबह, ग्यारह बजे
बुखार से तप रही अपनी माँ को
डॉक्टर को दिखाने के लिए
जल्द ही ले जाना था
रिक्षे पर चढ़ाना था
तब, रिक्षे पर
स्वयं चढ़ने में असमर्थ
अपनी माँ को मैंने –
अपनी गोद में उठाया
और, रिक्षे की सीट पर
पहले से बैठे हुए
बाबूजी के बगल में उसे बिठाया
बस, इतनी-सी देर में
मुझ निस्संतान को
एक कन्या को गोद लेने
और फिर,
उसका कन्यादान कर देने –
दोनों ही का अनुभव एवं
सुफल एक साथ मिल गया
क्या कहूँ मैं ‘निर्दोश’,
मेरा अनुर्वर अंतर्मन खिल गया।

गोपाल प्रसाद ‘निर्दोष’

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