सोच

बहुत ही हैरानी और खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि लोग अपने पसंदीदा हीरो की फिल्म देखने या मनपसंद होटल के आगे लंबी कतारें लगा अपने बारी का इंतिजार करने को कभी इस प्रकार से जिक्र नहीं करते जितना आज नोट के लाइन में लग कर सरकार की किरकिरी में लगे हैं. आज दिल्ली की सड़कों पर घंटों की जाम में फंसे होते हैं उसकी शिकायत नहीं होती, एक आदमी कितनी गाड़ियां रखते है ,क्या कभी सोचते हैं कि समाज के लिए वो कितनी परेशानियां खड़ी करते हैं. AIIMS में लगी कतारें क्या कभी शिकायत करती हैं लाइन में खड़े होने को लेकरे. शादियों में इतने खर्चे,आतिशबाजियां,शराब और घंटों सड़क जाम _तब कब किसी ने कभी आम लोगों की परेशानियां सोची? जहां तक गरीबों के हित के सोचने की बात है तो हम निःस्वार्थ भाव से तो कभी भी मदद नहीं करते बल्कि अंतपरिणाम पहले सोचते हैं. आज अमीरों के गलत पैसे बेशक लाइन में लगने और कमीशन के रूप में ही लग कुछ लोग पैसे कमा भी रहे हैं तो गलत क्या, मेहनत के ही हैं कोई काला धन तो नहीं कमा रहे.
आज हम कितने आराम तलब हो गए, कि, परेशानियां सच में जिन्हें हो रही ,वो तो मुस्कुरा कर कह रहे कि ,सुखद भविष्य के लिए ये एक और परेशानी भी सही. पर जिन्हें आम आदमियों के साथ घण्टों लाइन में लगना पड़ रहा , वो आम आदमी के खैर ख्वाह नही पर उनकी अपनी स्थिति आपत्तिजनक लग रही है.
जरा सोचिए ,आज के हालात को, जो कि बद से बदतर हो चुकी है उसका दोषारोपण सरकार पर क्यों.उसने सिर्फ आइना ही तो दिखाया इस घुन खाये समाज की. याद रखें , चाहे आप जो भी इस सरकार का नाम दें _तुगलकी ,हिटलरशाही या और भी कुछ, कोई भी कार्य के पीछे कारण भी होता है और समय की मांग भी . वक्त हमेशा हमें सचेत करते रहती है बशर्ते की हम वक्त के इशारों को समझें .याद रहे कि वक्त के इशारे को समझने या नासमझी से ही उत्पन्न होता है हमारा उत्थान और पतन का बीज.
आज अभी अचानक आये आंधी तूफ़ान या भूचाल जैसे माहौल हालात हमारे ख़ुशी की सोच के लिए क्या कम है कि धन के मालिक की भी गलतफहमी दूर होते देख रहे हम. आम इंसानों की तरह उन्हें भी कानून का खौफ सता गया, इज़्ज़त लूटने का खतरा भी एक ज़लज़ले का काम कर गया. आज फिर, वो फिर से एक गलती कर बैठे ,जो कमीशन पर गरीबों को खरीदा और खुद को पैसे के आगे उन्ही गरीबों के आगे झुकते देख रहे.आज से पहले क्या हमने नोटों की बोरियां इस तरह से देखी थू क्या! वह भी नदी में बहते और अग्नि देवता को आहुति देते? याद रखिए आज अगर सरकार के इस पहल का साथ ना दिया तो राजनेता का कुछ घाटा नहीं होगा , फिर जो भविष्य में सरकारें आएँगी वो क्या होंगी और इल्जाम सारा आम जनता पर होगा.
थोड़ी सी असुविधा से इतना उतावला ना होयें , शिकायत से पहले खुद से ज़रा सवाल करें की हम अपने में कितना सही हैं,परिवार और समाज के प्रति हम कितने उत्तरदायी हैं. शायद इतना सोचते रहते तो ऐसी परेशानियां कभी आती नहीं और दूसरे देशों की सुदृढ़ता और संपन्नता देख लालायित भी नहीं होना पड़ता, तब जबकि सारी सलाहियतें और सहूलियतें हमारे देश में किसी भी अन्य देशों के मुकाबले बहुतायत हैं.
*मैं अपने बारे में यही कह सकती की मैं किसी खास पार्टी की व्यक्तिगत हिमायती नहीं , बस आम नागरिक की तरह सरकार के कार्य शैली से जिस प्रकार से मेरी सोच प्रभावित होती है वैसा ही नज़रिया मेरा निकल कर आता है.

अपर्णा झा

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This Post Has One Comment

  1. Bahut khoob Aparna ji..
    Sach kaha aapne ki baki pareshaniyon ke liye to itni hay tauba nahin machti kabhi….or phir har cheez ko thoda waqt to milna hi chahiye nateeje ke liye….

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