बगिया

बेचैन है मन
षब्द का अभाव क्यूँ है
धड़कन भी थमकर धड़कती
संवेदना की हार क्यूँ है
’अनुभूति’ और ’सह’
दोनों नदी के दो किनारे
’स्व’ व ’अनुभूति’ हर एक दिल में बसी है
आओ ’स्व’ को भूल जाएँ
संवेदना को थपथपाएं
’सह’ में मिलें-’मैं’और ’तुम’
ख़ुषी से हँसें और खिलखिलाएँ
अब हम बने मैं और तुम
’मैंने किया यह’ भूल जाएँ
’तुमने किया वह’ भूल जाएँ
सबको मिलाएँ ’सह’बनाएँ
संवेदना के संग
सब अनुभूतियाँ हों
देष की बगिया हँसे, सब खिलखिलाएं
’मैं’और ’तुम’ को छोड़कर
बस
’हम’ बनें और ’हम’ बनाएँ।

अनिल कुमार मिश्र

No votes yet.
Please wait...

Leave a Reply

Close Menu