जब दीवारें भीतर उगने लगती है

एक अपराध-बोध से ग्रसित हूँ ‘मैं’
इन दिनों ! कि –
मेरे ही समाने तोड़ दी गई कमर
काट दिए गए पाँव
छीन ली गई ज़मीन
निकाल दी गई आँखें
बदल दिए गए चेहरे
छुपा दी गई पहचान ( एक झटके से )
कि – मेरे ही सामने !
नहीं ऐसी कोई बात नहीं थी कि –
मैं अँधा था या कुछ नहीं समझता
मैंने सब कुछ निकट से देखा
अनुभव किया, छटपटाया
लेकिन बंधा न था कहीं से भी
किसी ओर से भी
मेरे हाथ खुले थे ! विरोध के लिए
मेरी ज़ुबान पर शब्द थे !
हाथ में एक खुली कविता !
मैं हर तरफ चिल्लाया
लेकिन, शब्द !
शब्द को हथियार तक न ला पाया,
नहीं, मैंने जाना ! कि –
शब्द हथियार से ज़्यादा कारगर कहाँ होते हैं,
जब दीवारें भीतर उगने लगती हैं
और बाहर आदमी जनतंत्र में निहत्था खड़ा होता है
तो शब्द भिड़ंत में मरा होता है
उस समय हथियार ही एक ऐसा मार्ग है
जो कारगर होता है।

सुशील कुमार शैली

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