इस सदी में

जिसके पास कुछ नहीं
थोडा बहुत चाहता है
जिसके पास है
थोडा बहुत
और ज़्यादा के इन्तजार में है
जिसके पास नहीं
बित्ता भर ज़मीन
फतह करना चाहता है पूरी दुनिया
ख्वाईषे अब ,महत्वाकांक्षा के हाथों से
लहराना चाहती है ध्वजा
ब्रम्हांड में
छोटे-छोटे बच्चें
जिन्हें ठीक से अपना नाम तक याद नहीं
वे घुमा रहे है ग्लोब
और, दुनिया को रखना चाहते है सिरहाने
हर कोई
आँख मिलाने लगा है सूरज से
और
धरती को डूबाने की फिराक में
लगा रहा तरकीब
घूरती हुई लाल आँखों को
देखकर लगता है
षायद
मंगल पर बसाना चाहता है दुनिया
इस सदी में।

उमेश चरपे

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This Post Has One Comment

  1. Mast kavita hai

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