तुम गीत, मैं शब्द

तुम गीत तभी लिखते हो
जब मैं शब्द बेचता हूँ
मोल तभी तक इन गीतों का
क्योकि मैं शब्द बेचता हूँ
शब्दों के सुंदर सगुंफन से
अर्थ लालितत्य सँवरता है
शब्दों के सुंदर संगुफन से
भाव नया नित्य निखरता है
जब गीत स्वरित होता ओज में
महफिल गूँज जाया करती है
जब दिल टूट रोता है वेदना में
तार मन के झंकृत हो जाते है
मन वियोगी जब खो जाता है
शब्द मनकों से बिखर जाते है
गीत प्रिय का विप्रलम्भ बन कर
अन्तस में बेधी शूल चुभो जाता है
तेरे गीतों का फिर क्या होगा यदि
शब्दों की ज्वाला इनसे निकले
हृदय भित्तियाँ सब जल राख हो गई
गीत सब जल के धुआँ कर उठे
प्यार से गीतों के शब्दों को सँभाला
विक्रेता बन तूने लगा दी बोली
गीत मधुर मिले उसी प्रिय प्रेमी को
छलनी हृदय मिले वियोगी को

डॉ मधु त्रिवेदी

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