आत्मकथ्य

बस से उतर कर एक गहरी सांस ली, मुझे इतना सुकून मिल रहा था जैसे कि कितने लम्बे समय के अंतराल के बाद मैने खुली हवा में सांस लिया हो, थोड़ी देर पहले गाड़ियों के जो हॉर्न मुझे अत्यंत कष्टदायी प्रतीत हो रहे थे वही अब मुझे निष्क्रिय लग रहे हैं, मैं पिछले एक घंटे से ट्रैफिक में फंसी हुई थी।
जब बस थोड़ी सी खिसकती तो हवा लगती तब जरा सी राहत की सांस लेती और बस फिर रुक जाती, पता नहीं कितने समय में चलेगी? एक तो मौसम उमस भरा फिर गाड़ियों का शोर और धुआँ…पीछे खड़ी गाड़ियों में बैठे ड्राइवर आगे जाने के लिए उतावले हो रहे थे, ये जानते हुए भी कि आगे रास्ता नही है वो हॉर्न पे हॉर्न बजाए जा रहे थे, मन में आ रहा था कि अभी बस से उतरूँ जाकर बोलूँ इन्हें कि अगर इन्हें संभव लगता है तो ये उड़कर चले जाएँ क्योंकि आगे वालों के लिए तो ये संभव नही, हर चेहरे पर एक ही सवाल था कि ये ट्रैफिक जाम क्यों लगा है ? एक युवक जो अपनी जिज्ञासा को अधिक देर तक रोक न सका बस से उतर गया कारण जानने के लिए….पाँच मिनट में ही वापस आ गया और अपने साथियों को कुछ इस अंदाज में बताया कि आसपास बैठे और लोग भी सुन सकें…आगे दो-तीन लोग एक पुलिस वाले को पीट रहे है! क्या! पुलिस वाले को! एक साथ आश्चर्य में डूबी हुई कई आवाजें एक साथ सुनाई दीं, क्या जमाना आ गया है.. भई पहले पुलिस वाले निर्दोषों को भी पकड़ कर पीट देते थे और आज जनता ही उन्हे पकड़कर पीट देती है, पीछे से किसी बुजुर्ग की आवाज आई | अरे अंकल जी हो सकता है किसी महिला को कुछ उल्टा-सीधा बोल दिया होगा, आज कोई गलत व्यवहार बर्दाश्त नहीं करता, आखिर कानून तो सबके लिए एक समान ही है न। किसी जागरूक नौजवान ने कहा जो उस बुजुर्ग व्यक्ति के पास ही बैठा था। “अरे नहीं भाई साहब! आज तो उस पुलिस वाले को कानून का पालन करने के लिए ही पीटा है कुछ मनचले दबंगों ने” एक नवयुवक (जो शक्लोसूरत से पढ़ा-लिखा दिख रहा था) बस में चढ़ते हुए कहा। “क्या बात कर रहे भाई साहब वो कैसे?” किसी ने पीछे से पूछा। मैं अभी तक चुपचाप उन लोगों की बातें सुन रही थी…”अरे भाई वो ट्रैफिक पुलिस वाला है, अपनी ड्यूटी कर रहा था, एक ही बाइक पर तीन लड़के वो भी बिना हेलमेट सवार थे, उस ट्रैफिक पुलिस वाले ने अपनी ड्यूटी निभाते हुए उन लोगों को रोक लिया, बस उन लोगों ने उस बेचारे को ही पीटना शुरू कर दिया।” उस नवयुवक ने कहा। “हे भगवान क्या जमाना आ गया है।” एक महिला बोली।
बस चल पड़ी शायद कुछ पुलिस वाले आ गए और वो लड़के भाग गए। भीड़ भी जो तमाशबीन बनकर अब तक तमाशा देख रही थी तेजी से अपने अपने रास्ते चली गई।
खैर जैसे-तैसे मै अपने स्टैंड पर पहुँच गई और थककर चूर होने के बावजूद मैं जल्दी-जल्दी चल रही थी ताकि जल्दी से घर पहुँचूँ और चलते हुए यही सोच रही थी कि घर पहुँचते ही नहाऊँगी फिर उसके बाद ही चाय-वाय पीऊँगी।
मैंने दरवाजा खटखटाया बेटी ने तुरंत ही दरवाजा खोल दिया, मै अपना पर्स सोफे पर एक तरफ लगभग फेंकते हुए खुद भी सोफे पर गिर सी पड़ी..टी०वी० का रिमोर्ट कहाँ है बेटा? किसी न्यूज चैनल पर लगा तो कहीं कुछ हुआ है शायद…मैंने बेटी को संबंधित करके कहा।बेटी ने चैनल बदल कर रिमोर्ट मेरे ही पास रख दिया | मैं चैनल बदल-बदल कर देखने लगी कि शायद किसी चैनल पर वो समाचार दिखा दें जिसकी वजह से मैं इतनी देर तक जाम में फँसी रही, अचानक टी०वी० स्क्रीन पर नीचे समाचार परिवर्तित हुआ और लिखा हुआ आने लगा “यमुना विहार में कुछ लोगों ने मिलकर की पुलिस वाले की पिटाई”…पुलिस वाले की पिटाई!!! सचमुच समय कितना परिवर्तित हो गया है, पहले लोग निरपराध होते हुए भी ‘पुलिस’ शब्द से भी डरते थे, गाँव में किसी के घर पुलिस आ जाती तो आसपास के लोग अपने घरों में दुबक कर झाँका करते, सामने आने से डरते थे कि कहीं उनसे ही कुछ पूछ लिया तो! कहीं उन्हें ही न थाने पर बुलाकर पूछताछ करने लगें, लोग पुलिस और थाने के नाम से ही दूर भागते थे और आज का समय है कि लोग दोषी होते हुए भी अपने अपराध के कारण डरने की बजाय पुलिस वाले को ही पीट देते हैं। ये कोई दादी-नानी से सुनी कहानी नही है मैंने तो खुद इसका अनुभव किया है कि किस प्रकार लोग शिक्षा के अभाव में अज्ञानतावश, व कानून से अनभिज्ञता के कारण निर्दोष होते हुए भी अपराधियों की भाँति कानून यानि पुलिस से भागते थे……..ये घटना उस समय की है जब मैं मैं कोई सात-आठ वर्ष की हूँगी……..
रात के अँधेरे ने अपनी चादर तान दी थी,चारों ओर घना अँधेरा कि हाथ को हाथ सुझाई न दे, सन्नाटे की आवाज कानों मे सांय-सांय कर रही थी ऊपर नीले आसमान मे तारे ऐसे टिमटिमा रहे थे जैसे कि विस्तृत नीली चादर पर किसी ने असंख्य हीरे बिखेर दिए हों, दूर से कहीं किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज आ रही थी, न जाने क्यूँ वातावरण इतना डरावना सा हो गया था कि अपने ही दिल के धड़कने कीे आवाज डरावनी लग रही थी शायद इसलिए क्योंकि माँ डरी हुई थीं। जो हमारा आधार हो, जो हमें आलंभ देता हो, जिसके आँचल के समक्ष वितान भी छोटा महसूस हो, जिसके आँचल तले हम खुद को इतना सुरक्षित पाते हैं जितना कि भगवान की छत्रछाया में भी नही..वही..वही माँ न जाने क्यूँ आज इतनी डरी हुई थीं, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। आखिर रात तो रोज ही होती है पर रोज के और आज के माहौल में इतना अंतर क्यों ? क्यों आज माँ इतनी सहमी हुई सी हैं? क्यों डर से मेरा दिल मुँह को आ रहा है? आखिर क्या होने वाला है? घर के बाहर खड़ी मैं अँधेरे में दूर मैदान के दूसरे छोर पर देखने की असफल कोशिश कर रही थी पर उधर अँधेरे में नीम के पेड़ की परछाई के अलावा मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, आँखें अँधेरे में पापा की परछाई को ढूँढ़ते हुए थकने लगी थीं मैं वापस घर के भीतर आने के लिए सोच ही रही थी कि तभी मैदान के करीब बीच तक पहुँच चुकीं दो तीन परछाइयाँ दिखाई दी मुझे। मैं डर गई क्योंकि पापा तो हो नही सकते…उन्हें तो अकेले आना चाहिए था, मैदान के किनारे-किनारे छोटे-छोटे घरों की कतार थी, सभी के दरवाजे बंद हो चुके थे। फिर मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वो लोग हमारे ही घर की तरफ बढ़े आ रहे हैं, मैं जल्दी से अंदर भागी…माँ-माँ बाहर दो-तीन लोग आ रहे हैं। मैंने माँ को बताया, क्या! वो भी घबरा गईं, कहाँ तक पहुँचे हैं? माँ ने फिर पूछा। चबूतरे के उस तरफ थोड़ी दूर हैं। मेरे ऐसा कहते ही माँ और घबरा गईं, मैंने तुझे बाहर इसीलिए खड़ा किया था न कि जब दूर से ही कोई परछाई दिखाई दे या जूतों की ठक-ठक सुनाई दे तो मुझे बताना, पर तेरा तो ध्यान ही पता नहीं कहाँ रहता है। बड़बड़ाती हुई माँ ने मेरे हाथ में दाल-चावल का वो कटोरा जल्दी से पकड़ाया जिसमें से वो मेरे छोटे भाई को खिला रही थीं…जल्दी से सबसे छोटे भाई को जो सो चुका था अपने कंधे पर डाला दूसरे का हाथ पकड़ा और लगभग खींचते हुए ही कहा चल…मैं हाथ में दाल-चावल का कटोरा पकड़े उनके पीछे-पीछे जल्दी-जल्दी चल दी। वो इतनी हड़बड़ी में थीं कि उन्होंने अपना जूठा हाथ भी नहीं धोया, बाहर आकर घर का दरवाजा भी बंद नहीं किया, घर के बाँयी ओर ही सटकर चाची(पड़ोसी) के घर के बरामदे में चढ़ गईं बिजली न होने से अँधेरे में कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, मुझे लगा कि अब वो दरवाजा खटखटाएँगी…पर ये क्या! उन्होंने उनके बंद दरवाजे को बाहर से कुंडी लगा दी और मुझे और मेरे भाई को फुसफुसा कर चुप रहने का आदेश दे कर घेर की तरफ मुड़ गईं….अब तक मैं इतना तो समझ ही चुकी थी कि हम उन परछाइयों से छिप रहे हैं, वह घेर भी चाची के जमीन का ही एक हिस्सा था जो बरामदे से सटा हुआ था; बाहर से देखकर तो ऐसा ही लगता था जैसे कि ये कोई पतली सी गली होगी जो दूर तक निकल गई होगी, किंतु वो दरअसल जमीन का खाली पड़ा तिकोना हिस्सा था कोई २५-३० गज का था, जिसमें घास और झाड़ियाँ उगी हुई थीं। वहीं उन्हीं घासों में बिना कीड़े-मकोड़ों से डरे एक कोने में माँ हम तीनों बहन-भाइयों को लेकर दुबक गईं, भाई को चावल-दाल खिलाने लगीं ताकि वो रोये नही। आज न सिर्फ माँ को बल्कि मुझे भी कीड़े-मकोड़े, साँप आदि से उतना डर नहीं लग रहा था जितना कि इंसानों से…अचानक जूतों की खट-खट सुनाई दी, वो लोग बरामदे तक आ पहुँचे थे, जरूर वो पहले हमें हमारे घर में ढूँढ़ कर फिर यहाँ आए होंगे। अब मुझे समझ आ रहा था कि माँ ने चाची का दरवाजा क्यों नही खटखटाया क्योंकि जितनी देर में वो दरवाजा खोलने आते उतनी देर में तो ये लोग हम तक पहुँच चुके होते, पर क्या यहाँ हम लोग बच जाएँगे? अगर हमें वहाँ न पाकर उन्होंने इधर झाँक भी लिया तो…? अब मुझे हमारा बचना मुश्किल लग रहा था। माँ पता नहीं क्या सोच रही होंगी, उनकी मनःस्थिति क्या है; मै कुछ समझ नही पा रही थी; हम साँस भी इतने धीरे-धीरे ले रहे थे कि कहीं हमारी साँसों की आवाज भी उन तक न पहुँच जाए। दरवाजा खुलवाएँ…तभी उनमें से एक की आवाज आई।
हाँ, अरे! लेकिन ये तो बाहर से बंद है। दूसरे की आवाज आई।
लगता है भाग गए और पड़ोसियों को पता भी नहीं। एक की आवाज आई।
हम चुपचाप साँसे रोके उनकी हर बात हर आहट सुनने की कोशिश करते रहे, मन ही मन मैं भगवान से प्रार्थना करती रही कि वो लोग इधर न आएँ। माँ ने तो मन ही मन न जाने कितनी मन्नतें माँग डाली होंगी, मैं तो डरी-सहमी माँ का हाथ पकड़े उनसे चिपक कर सहमी सी खड़ी रही पर वो तो अपना डर भी किसी से बाँट नहीं सकती थीं पापा भी पता नहीं कहाँ रह गए थे। रोज पाँच बजे आ जाते थे और आज इतनी रात तक भी नहीं आए थे, पता नहीं ये सब क्या और क्यों हो रहा था। दिमाग में सवालों का तूफान सा चल रहा था, मन कर रहा था कि माँ से पूछूँ..पर अभी तो बोल भी नहीं सकती थी। ये समय टल जाय, ये लोग जो भी हों यहाँ से चले जाएँ…सवाल तो मैं बाद में भी पूछ लूँगी…इधर देखें ? अचानक आवाज आई और ऐसा लगा कि वो लोग हमारी ही तरफ आने को मुड़े हैं…अब क्या होगा????…डर के मारे मेरे पैर काँपने लगे..आँखों से आँलू छलक आए,मैंने माँ को कसकर पकड़ लिया, अँधेरे में माँ का चेहरा साफ नजर नहीं आ रहा था पर शायद उनकी भी ऐसी ही स्थिति थी…ऐसा लगा किसी का पैर दिखाई दिया, अँधेरा अधिक होने के बावजूद अब तक आँखें अँधेरे में देखने की अभ्यस्त हो चुकी थीं शायद इसीलिए मैं देख पाई…तभी दूसरे साथी की आवाज आई अरे अब इधर क्या वो लोग खड़े होकर हमारा इंतजार कर रहे होंगे, अब तक तो क्या पता कहाँ निकल गए होंगे, चलो समय बर्बाद मत करो…और वह पैर जैसे घेर के भीतर आया था वैसे ही तुरंत बिना एक भी पल गँवाए वापस बाहर चला गया. फिर वही जूतों की ठक-ठक..परंतु इस बार दूर होती हुई। अब माँ ने एक गहरी साँस ली मानो कब से साँसें रोके खड़ी थीं, मेरी पकड़ भी ढीली पड़ गई। मेरे दिमाग में एक नए प्रश्न ने जन्म ले लिया कि इनके जूतों से इतनी तेज ठक-ठक की आवाज क्यों आती है? मेरे पापा के जूतों से तो नहीं आती! पापा..आं..पापा अभी तक नहीं आए, माँ पापा क्यों नही आए अब तक? मैंने बेचैन होकर पूछा। अब तक हृदय उन आगंतुकों के भय से ग्रस्त था परंतु अब उधर से आश्वस्त हो गया तो पापा के लिए अंजाना सा डर फिर सताने लगा। आ जाएँगे, माँ ने लम्बी सी साँस छोड़ते हुए जवाब दिया, जैसे कितने बड़ी चिंता को साँसों के जरिए बाहर निकाल देना चाहती हों….उसी स्थिति में जैसे हम गए थे वैसे ही बाहर आए..पर हाँ माँ चाची के दरवाजे की कुंडी खोलना नहीं भूलीं, हम फिर घर में आ गए। घर में घुसते हुए भी माँ थोड़ी सतर्क नजर आ रही थीं, उन्हें ऐसे चौकन्ना देख मुझे भी डर लगने लगा। कितना अजीब है न ये समय जो घर अभी कुछ देर पहले तक हमें पनाह देकर हमारे सारे दुख और डर से हमे बचा रहा था अभी वही घर एक पल में डरावना सा लगने लगा है, तेल के दिए की कमजोर सी रोशनी अभी भी घर में ज्यों की त्यों बिखरी हुई है, फिरभी ऐसा लग रहा है कि कहीं कोई छिपा हुआ बैठा न हो। धीरे-धीरे माँ भीतर के कमरे में गईं और छोटे भाई को गोद से चारपाई पर सुला दिया। बाहर आईं तो आश्वस्त दिखाई पड़ रही थीं, अब विश्वास हो गया कि घर में हमारे अलावा कोई नही है। उन्होंने बड़े भाई जो लगभग चार साढ़े चार साल का था उसे खाना खिलाया। पर मुझे तो पापा का इंतजार था मैं तो उन्हीं के साथ खाऊँगी..बेटा अब खा ले पापा देर से आएँगे आज ओवर टाइम कर रहे हैं, खबर तो भिजवा दिया था शाम को ही। माँ ने कहा।
तो पहले क्यों नहीं बताया, मैंने तुनक कर कहा।
पहले थोड़ा परेशान थी न इसीलिए, चलो अब खाना खाओ और सो जाओ।
माँ वो लोग कौन थे? ..मैंने उत्सुकता से पूछा,
पुलिस। माँ ने बताया
क्या ! ल..लेकिन..पुलिस हमारे घर क्यों आई थी ? कहीं वो लोग पापा को पकड़ कर तो नहीं ले गए? मैंने डरते हुए पूछा
नहीं नहीं ऐसा नहीं है , बेटा वो लोग पापा के ऑफिस के किसी दूसरे आदमी को ढूँढ़ रहे थे, और उस आदमी के जितने भी दोस्त और रिश्तेदार होंगे उन सभी के घर उसे ढूँढ़ेगे। माँ ने बताया।
तो हम लोग क्यों छिप रहे थे? मैने मासूमियत से पूछा।
अगर हम उन्हें मिल जाते तो वो हमसे पूछते और हम नही बता पाते तो वो हमें परेशान करते, इसीलिए पापा ने कहलाया था कि हम छिप जाएँ..माँ ने मुझे समझाने की कोशिश की। अब तक भाई नीचे फर्श पर बैठा-बैठा माँ की गोद में सिर रख कर सो गया था…चलो तुम भी खाकर सो जाओ, माँ ने कहा और मुझे खाना खिलाने लगीं |
माँ छोटे-छोटे निवाले बना-बना कर मुझे खाना खिलाती रहीं और न चाहते हुए भी बार-बार उनकी नजर दरवाजे की तरफ उठ जाती, वो अभी भी बेचैन दिखाई दे रही थीं वैसे वो बहुत कोशिश कर रही थीं मुझसे अपनी बेचैनी छिपाने की..मैं बहुत छोटी थी फिरभी इतनी समझदार तो थी ही कि अपनी माँ के चेहरे पर बदलती भाव-भंगिमाओं को समझ सकती थी | आज सोचती हूँ तो समझ पाती हूँ कि उस समय मेरी माँ की मनःस्थिति क्या रही होगी? जिस प्रकार हर बच्चा अपनी माँ की गोद में आकर दुनिया भर की खुशियाँ प्राप्त कर लेता है और स्वयं को सबसे बड़ा धनाड्य समझता है, जिस प्रकार एक बच्चा पिता की उँगली थाम कर स्वयं को सभी मुश्किलों सभी डर से सुरक्षित महसूस करता है उसी प्रकार एक पत्नी भी परिवार के अन्य सदस्यों की अनुपस्थिति में अपने पति की उपस्थिति में ही स्वयं को सुरक्षित और दृढ़ महसूस करती है | माँ ने मुझे खाना खिला कर बिस्तर पर लिटा दिया और हमारे ही पास बैठ गईं धीरे-धीरे मेरा सिर सहलाते हुए कुछ सोचने लगीं, मुझे निद्रा ने कब घेर लिया मुझे पता ही नहीं चला।
चहल-पहल की आवाज सुनकर मेरी नींद खुली। छोटा भाई रो रहा था शायद दूध के लिए क्योंकि माँ दूध उबाल रही थीं, और बड़ा भाई पापा की गोद में….अरे! पा..पा.. पापा मैं खुशी से उछल पड़ी, जैसे मन की मुराद पूरी हो गई हो, मेरे पापा मेरे सामने जो थे | कब आए आप, इतनी देर क्यों कर दी? पता है हम लोग कितना डर गए थे? आपको क्या, हमें भी तो अपने साथ लेकर जा सकते थे। मैं बिना रुके लगातार बोलती जा रही थी और माँ मुस्कुराती हुई चुपचाप मुझे देख रही थीं।
अरे बाबा चुप होगी तब तो मैं बोलूँगा, मालूम है, माँ ने बता दिया था। मैंने मासूमियत से जवाब दिया..लेकिन पापा वो लोग दुबारा तो नहीं आएँगे? मैने पापा के बगल में बैठते हुए उनकी बाँह ऐसे मजबूती से पकड़ ली जैसे मैं कहना चाहती हूँ कि अब मैं आपको जाने नहीं दूँगी | अरे पगली डरती क्यों है आज सब ठीक हो जाएगा, पुलिस वाले ही तो थे, जिनके लिए आए थे वो आज जाकर कचहरी से जमानत ले लेंगे फिर हमारा कोई लेना-देना ही नहीं….फिर क्यों आएँगे | पर पापा उनसे कहना कि जरूर-जरूर से जमानत ले लें उनकी वजह से हम कितने परेशान हुए हैं उन्हें कहाँ पता? मैंने ऐसे जिद किया जैसे खिलौना माँग रही हूँ, क्यों न हो! हर बेटी का पिता उसके लिए भगवान के जितना महत्त्व रखता है बेटी की नजर में दुनिया में ऐसा कोई कार्य नही जो उसके पिता न कर सकें, मेरे पापा भी मेरे लिए हीरो ही थे और मुझे पूर्ण विश्वास था कि वो सबकुछ कर सकने में सक्षम थे फिर जमानत क्या चीज थी। ये तो मुझ नादान की समझ में पापा के लिए दुकान से लालीपॉप खरीद कर लाने जितना आसान था |
मम्मी..मम्मी…अचानक बेटी की आवाज आई…ह..हाँ बेटा! क..कुछ कहा क्या ? मैं विचारों मे इतनी खो गई थी कि मुझे होश ही नही रहा कि मुझे नहाना भी है | विचारों में तल्लीनता के कारण मैं गर्मी और पसीने से होने वाली चिपचिपाहट भी भूल गई थी…..
आप चाय पियोगी? बेटी ने पूछा
हाँ तू चाय बना तब तक मैं फ्रेश हो जाती हूँ…..कहकर मैं बाथरूम की तरफ बढ़ गई……

मालती मिश्रा

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