विज्ञान

एक असमर्थ,असहाय
वृद्धा के
एकमात्र अवलम्ब
उसके युवा पुत्र की भागती आत्मा को
क्या तुम वापस ला सकते हो?
क्या दो घंटे तक उसे जीवन दे सकते हो?
उसका पुत्र एक ही तो है
अपने पिता की खातिर,खून बेचकर
रोटी लेकर आता ही होगा
विज्ञान!
मैं तुमसे पूछता हूँ,सिर्फ तुमसे
मालूम है मुझे
तू मौन क्यूँ है
तू तो अभी नादान है
तेरी नयी पहचान है
बता
आदमी मरता है क्यूँ
और कौन उसको त्यागता
जाता कहाँ है त्यागकर
इतना बता
बस मान लूँगा मैं
कि तुझमे ज्ञान है
आज तक तुझको यही मैं मानता
“विज्ञान!तू कुछ भी नहीं
परिष्कृत अज्ञान है।”

अनिल कुमार मिश्र

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