संत सिपाही

एक संत चला है संत की राह
दूर क्षितिज में अनन्त की राह,
आंधी झेली पतझड़ झेला
निकल पड़ा वो वसन्त की राह।
इस जीवन का सार छद्म है
जीवन बस दो चार कदम है,
चलते रहना है गंगा की धारा बन
एक सच्चे पवित्र महंत की राह।
एक और निराला है कहीं
एक और मधुशाला है कहीं,
चल पड़ा वो निडर निर्भीक बन
छायावाद के पन्त की राह।
एक और सीता का अपहरण हुआ
आज नही कोई राम है आया,
पर उसको तो चलना होगा
आज फिर हनुमंत की राह।
एक और द्रोपदी तड़प रही
चीर सम्भाले सिमट रही,
प्रहार करने दुर्योधन की जंघा पर
चल पड़ा इस महाभारत के अंत की राह।

लव कुमार

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