मैं एक माँ हूँ
मेरी अनुभूतियाँ
जब विचारों से सहवास करती हैं
तब रचनाएँ
मन के गर्भ में
आकार लेने लगती हैं
मैं उसे पुष्ट करने के लिए
समय-समय पर
पौष्टिक आहार देती रहती हूँ –
षब्दों और वाक्यों के रूप में…
और तब,
जब प्रसव के दिन पूरे हो जाते हैं
उसे प्रसूत करने की पीड़ा
चरम पर पहुँच जाती है
मैं षीघ्रताषीघ्र
कागज, कलम और
एकांत की खोज में लग जाती हूँ
और,
जब मेरी रचना प्रसूत होकर
कागज पर उतर आती है
तब,
प्रसव वेदना से
मुझे मुक्ति मिल जाती है
तन-मन हल्का हो जाता है
दूसरे लोग उसे देखते,
सहलाते और पुचकारते हैं
मेरा मन-प्राण उल्लास से भर जाता है
मेरी रचना
धीरे-धीरे बड़ी होती है
अपने पाँवों पर खड़ी होती है
मेरा काम करती है
दूसरे के काम आती है
इस प्रकार,
मेरी सृष्टि
जनहित को समर्पित हो जाती है
जैसे कोई तनुजा
दो कुलों के काम करती है
दोनों कुलों को समर्पित हो जाती है…

— डॉ. गोपाल निर्दोष

Say something
No votes yet.
Please wait...