चलते चलते का हालचाल पूछते चलें,
सियासत कैसी चल रही है पूछते चलें |

कल मजमा है बढ़ चढ़कर बहसें होंगी,
कुछ एजंडा कुछ ख़्यालात पूछते चलें |

कितनी दूर का खेला दाव कितना गहरा,
कुछ प्रभाव  कुछ परिणाम  पूछते चलें |

हम तो अनाड़ी है कहाँ समझते हैं बात,
चलते मुहावरों के व्यवहार पूछते चलें |

कल वो अचानक चलन से बाहर हो गया,
चलते चलते उसके ज़ज़्बात पूछते चलें |

आज सड़क पर पड़े हैं कुछ पर कटे परिंदे,
चलो ! उनकी उड़ाने आकाश पूछते चलें |

 

— सुशील कुमार शैली

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