एक दिन अचानक मेरी माँ के मन में बैठे – बैठे माँ वैष्णों देवी के दर्शन की लालसा जाग उठी। उन्होंने पिताजी को फ़ोन मिलाया और तत्काल में टिकट बुक करा दी। मेरे मामा भी माता रानी के दर्शन की बात सुनकर मन में फुले नहीं समा रहे थे और अलीगढ से मेरठ आ गए। सारी तैयारी हो चुकी थी। ऐसा लग रहा था कि मानो माता वैष्णो देवी खुद निमंत्रण देकर बुला रही हो। फिर हम 6 पारिवारिक सदस्य रात्रि को सोते-जागते माँ के दर्शन के लिए निकल पड़े।

मेरठ से 10-11 घंटे के लंम्बे सफर के बाद हम सुबह 5 बजे जम्मू पहुँचे। थकान तो हो रही थी पर माता वैष्णो देवी के दर्शन के उत्साह में हम सब कुछ भूल चुके थे। फिर यह के पहाड़ी मार्ग से कटरा की यात्रा शुरु हुई तो मन खुशी से झूमने लगा। पहाड़ देखते ही मेरा मन उसमें डूब जाता है। आखिर यह परमात्मा की सबसे अनुपम रचना जो ठहरी! एक ओर घुमावदार ऊँची-नीची सड़क पर सरपट भागती बस की खिड़की से पहाड़ियों की तलहटी में बहती नदी और सुदूर हिमपूरित तराइयों में हिमावृत्त चोटियों पर सूर्य किरणों के पड़ने से बनते अद्भुत रंग के नीले, पीले, कुमकुम जैसी चित्ताकर्षक दृश्यों के इन्द्रधनुषी रंगों में डूबना बड़ा सुखकारी बन पड़ा। वहीं दूसरी ओर ऊँचे-ऊँचे अपार अनगिनत वृक्ष समूहों से आती शीतल मंद पवन के झोंखों से मन झूम उठा। प्रकृति के पल-पल परिवर्तित रूप बडे उल्लासमय और हृदयाकर्षक होते हैं। वह मुस्कराती रहती है; सर्वस्व लुटाकर भी हँसती है। सूर्योदय हो या सूर्यास्त का समय प्राकृतिक छटा अनुपम और मनोमुग्धकारी होती है। ऐसी ही कश्मीर की
प्राकृतिक सौंदर्य से मंत्रमुग्ध होकर अनुभव शर्माजी गा उठे-
भव के दुखो का बेड़ा पार,
होता माता के दरबार में।
हम भी चले, तुम भी चलो,
माँ वैष्णो के दरबार में।

जम्मू की पहाड़ी वादियों में डेढ़-दो घंटे चलते – कूदते हुए हम कब कटरा पहुँच गए, इसका पता ही नहीं चला। कटरा पहुँच कर वहाँ हमने धर्मशाला में रुकने का निर्णय लिया और दो कमरे किराये पर लेने के बाद हम सभी नहा-धोकर और खाने-पीने के बाद शाम 4 बजे माँ वैष्णों देवी के दर्शन के लिए चल दिए। आते-जाते भक्तों के साथ हमने भी बड़े उत्साहपूर्वक ‘जय माता दी’ ’’सच्चे दरबार की जय’’ के स्वर में स्वर मिलाया और बाण गंगा पहुंचे। वह का नाजरा बड़ा ही आलोकिक था और बाण गंगा में सुन्दर व् रंग-बिरंगी मछलियों को देखकर बचो को बहुत आनंद मिलता प्रतीक हो रहा था। फिर हम लोगों ने धीरे-धीरे चरण पादुका और आदिकुमारी की चढ़ाई चढ़नी प्रारम्भ की। कभी घुमावदार तो कभी सीढ़ीनुमा रास्ते से हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते चल दिए।

बच्चों का उत्साह देखकर मन को बड़ी राहत मिल रही थी। वे ‘जय माता दी’ का उद्घोष करते हुए हरदम हमसे चार कदम आगे बढ़ते जा रहे थे। और हम शहर में रच-बस चुके बड़े बूढ़े लोग तो थोड़ी चढ़ाई चढ़ते ही थककर बार-बार जहाँ-कहीं जगह मिली आराम करने बैठ जाते, लेकिन बच्चों का जोश बरकरार रखने के लिए उनकी मनपंसद चीजें जैसे- चाकलेट, चिप्स, बिस्कुट आदि खिलाना-पिलाना थोड़ा महंगा जरूर लग रहा था पर कुछ भी नहीं था। हमारे शरीर में एक तरफ चाय-कॉफी पीने से फुर्ती आ रही थी तो दूसरी तरफ अपने परिवार के भरण-पोषण के वास्ते अपने कंधों पर पालकी उठाये बिना विश्राम किए तेजी से कदमताल करते हुए चुपचाप श्रद्धालुओं को उनके गंतव्य तक पहुंचाने वाले मजदूरों, घोड़े-खच्चरों में लदे लोगों को तेजी से हाँककर ले जाने वालों, तेल मालिश करने वालों और एक आध किलोमीटर की दूरी पर ढोल – ताशे बजाने वालों को सोच-विचारने पर थके-हारे पैरों में जान आ रही थी। इसके साथ मैं समझता हूँ कि सदस्यों के साथ पैदल मिलजुल कर, एक दूसरे को सहारा देते हुए माँ वैष्णों देवी की यात्रा करने में जो आनंद है, वह अत्यंत आनदमयी अनुभूति है।

रात्रि लगभग 7 बजे आदिकुमारी पहुंचकर गुफा मंदिर में दर्शन कर होटल में खाने-पीने और थोड़ा सुस्ताने के बाद हमने लगभग 10 बजे ’माता के भवन’ की यात्रा आरम्भ की। दुर्गम पहाड़ी रास्ते में अभूतपूर्व जन सुविधाओं जैसे- जगह-जगह यात्रियों की सुविधा के लिए शेड, पीने के लिए स्वच्छ पानी, टायलेट, बिजली की चौबीस घंटे निर्बाध आपूर्ति देखकर मन खुशी से खिल उठा। चलते-चलते एक बार भी नहीं लगा कि हम जिस समतल राह पर आसानी से चल रहे हैं, वह कोई दुर्गम पहाड़ी है। हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए बीच-बीच में जितनी बार विश्राम करते, उतनी बार पहाड़ों के झुरमुट से तलहटी स्थित लाखों सितारों जैसे जगमगाते कटरा की खूबसूरती को देखना नहीं भूलते। यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक वह हमारी आँखों से ओझल न हुआ।

माँ के दरबार के करीब पहुंचते ही ‘जय माता दी’ की सुमधुर गूंज कानों में पड़ी तो माँ के दर्शनों की तीव्र उत्कण्ठा के चलते हमारे कदम तेजी से उस ओर बढ़ चले। यहाँ यात्रियों का परस्पर प्रेम देखकर लगा जैसे मानो यही धरती का स्वर्ग है। सुगमतापूर्वक माँ के दर्शन हुए तो मन को असीम शांति मिली। धर्मशाला में 3-4 घंटे आराम करने के उपरांत हमने सुबह-सवेरे एक बार फिर भैरवनाथ के दर्शनों के लिए चढ़ाई चढ़कर उस पर फतह पायी। वहां लंगूरो को केले खिलाये और उनके साथ तस्वीरें भी ली। माँ के सुनहरे भवन और प्राकृतिक सौंदर्य में गोते लगाते हुए जब हमने भैरोनाथ के दर्शन किए तो यात्रा पूरी होने पर मन को बड़ा सुकून मिला। थोड़ी देर चहलकदमी करने के बाद हम आदिकुमारी होते हुए कटरा के लिए निकल पड़े। आदिकुमारी पहुंचकर थोड़ा खा-पीकर और सुस्ताने के बाद हमने कटरा की राह पकड़ी।

सीढ़ियाँ उतरते समय हमारी आपस में घर पहुंचकर सबसे पहले कन्या भोज करवाने की बातें चल रही थी। लेकिन मुझे घर आकर कन्या भोज करवाने से अच्छा पेट की खातिर सीढ़ियों पर माँ की चुनरी ओढ़े, दो पैसे की आस लगाई बैठी कन्याओं को दान-दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लेना ज्यादा उचित और फलदायी लगा। फिर हमने मोबाइल में खींची हुई तस्वीरो जैसे की माँ के दरबार, भैरवनाथ और आस-पास की फोटो नानी नाना व परिवार के अन्य सदस्यों को व्हाट्सप्प पर भेजी तो उन्हें भी माँ के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कटरा पहुंचकर हम सबने नहा-धोकर फोटो स्टूडियों में माता रानी के सजे दरबार में एक सामूहिक फोटो भी खिंचवा ली। और फिर हम जम्मू के लिए निकल पड़े। रात्रि 9 बजे हमने मेरठ के लिए जम्मू से शालीमार एक्सप्रेस पकड़ी और माँ वैष्णो देवी का स्मरण करते हुए हम सुबह लगभग 8 : 45 बजे वापस आकर हम सब अपनी दुनिया में लौटकर उसमें खो गए। मेरी माँ भी बहुत ही सुखद अनुभव कर रही थी। और उन्होंने फिर से माता के दरबार जाने की अपनी उत्कृष्ट इच्छा जाहिर की।

’जय माता दी’

अनुभव शर्मा

No votes yet.
Please wait...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *