बिखरे कांटे बहुत है तुम ना चल पाओगे

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बिखरे कांटे बहुत है तुम ना चल पाओगे

By |2018-01-21T15:47:21+00:00February 9th, 2017|Categories: कविता|4 Comments

प्रीति की चाह में

इश्क की राह में, 

बिखरे कांटे बहुत हैं,

तुम ना चल पाओगे।

जब जमानें की बंदिशे

लगेगी तुम्हें,

देखना टूट कर तुम

बिखर जाओगे।।

 

क्यूं मोहब्बत को तुमनें

खुदा कह दिया,

बाखुदा सारी महफिल

है दुश्मन यहां,

दुनिया वाले खडे है

खंजर लिये,

वार किस किस का

सीनें पे सह पाओगे।

 

तुमनें अपना मुझे तो

बना ही लिया,

क्यूं ना सोचा कि क्या

इसका अंजाम है।

मैं हूं चन्दा तुम हो

चकोर प्रिये,

मिलन जिनका जहां में

नाकाम है।

 

मेरी बातें और यादें

भुला दो सभी,

और भुला देना

हम तुम मिले थे कभी,

ये जमाना बडा है

सितमगर यहां,

इससे टकराये तो तुम

उजड जाओगे।

 

प्रीति की चाह में,

इश्क की राह में,

बिखरे कांटे बहुत हैं

तुम ना चल पाओगे।

 

— सुरेन्द्र श्रीवास्तव

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4 Comments

  1. सुबोध February 11, 2017 at 10:17 pm

    बहुत सही कहा आपने
    बिखरे कांटे बहुत है तुम न चल पाओगे

    Rating: 3.4/5. From 8 votes. Show votes.
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  2. Vikram Srivastava May 22, 2017 at 7:58 pm

    वाह…शानदार रचना

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  3. Poojatilwani.tilwani4@gmail.com July 5, 2017 at 10:03 am

    ख़ूबसूरत

    Rating: 3.8/5. From 5 votes. Show votes.
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  4. saurabh January 20, 2018 at 12:05 pm

    syahi me pragardhta hai….sunder

    Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
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