भरे बाजार में दुपट्टा

उनका सरक गया,

बुड्ढों की आहें निकल गई,

जवानों का दिल भटक गया।

पंडित जी नें कनखियों से देखा,

कोई उनको न देख ले,

चेहरे पे अंगौछा लपेटा,

हुश्न के नजारे में कुछ

एैसे खो गये,

टमाटर एक बार लिया,

पैसे दो बार दे गये।

 

पहले तो सब्जी वाला

पैसे लेनें मे अचकचाया,

दुबारा कैसे लूं

ये सोच के घबराया,

लेकिन वो भी पुराना पापी था,

पंडित जी की नस नस से

अच्छी तरह वाकिफ था,

सोचा चलो पंडित जी को

कुछ समझाया जाये,

कुछ ऊंच नीच की बातें

बताया जाये।

 

बोला चाचा बुढापे में अब क्या

जलवे दिखाओगे,

उम्र में तिहाई लडकी से

क्या इश्क लडाओगे।

 

पंडित जी वैसे तो

परम ग्यानी थे,

लेकिन साथ ही साथ

पैदाइसी हरामी थे।

बोले बेटा वैसे तो इश्क में

उम्र का अन्तर देखना बेकार है,

अगर लडकी तैयार है तो

दिग्विजय सिंह भी तैयार है।

 

ये तो एक उदाहरण मात्र है,

अभी अपनी सूची में एक और

भी पात्र हैं।

ये जो शख्स है वो

सारे बुड्ढों का प्रणेता है,

एन डी तिवारी नाम है

बहुत बडा नेता है।

 

वैसे भी उम्र का अन्तर

समय के साथ कम हो जायेगा,

अभी वो बीस और मैं साठ

तो अन्तर तिगुना आयेगा,

लेकिन बीस साल बाद ये

दो गुना ही रह जायेगा

जैसे जैसे उम्र बढेगी अन्तर

और भी कम हो जायेगा,

बुढापे तक ये घट के मामूली

ही रह जायेगा।

 

पंडित जी के तर्कों से सब्जी

वाला बेहाल हो गया,

मधुमक्खी के छत्ते में हाथ लगा हो

एेसा उसका हाल हो गया

बोला पंडित जी माफ करो

हमसे गलती हो गई,

पंडित जी विजेता की तरह पलटे,

फिर सिर झुका के बोले,

“अबे तुझसे बहस के चक्कर में

लडकी ही चली गई।”

— सुरेन्द्र श्रीवास्तव

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