यादों की बस्ती

है ख्वाबों की वो, बनती बिगरती इक छोटी सी बस्ती,
कुछ बिछड़ी सी यादें उनकी,अब वहीं हैं रहती……

है अकेली नहीं वो यादें, संग है उनके वहीं मेरा मन भी,
रह लेता है कोने में पड़ा, वहीं कहीं मेरा मन भी,
भूली सी वो यादें, घंटो तलक संग बातें हैं मुझसे करती,
बस जाती है वो बस्ती, बहलता हूँ कुछ देर मैं भी।

यूँ हीं कभी हँसती, तो पल भर को कभी वो सँवरती,
यूँ टूट-टूटकर कर कभी, बस्ती में वो बिखरती…..

हर तरफ बिखरी है उनकी यादें, बिखरा है मेरा मन भी,
संभाले हुए वो ही यादें, बैठा वहीं है मेरा मन भी,
टूटी हुई वो यादें, सुबक-सुबक कर बातें मुझसे करती,
फिर ख्वाब नए लेकर, सँवरती है वो ही बस्ती।

आँखों से छलकती, कभी कलकल नदियों सी बहती,
यूँ ही कभी विलखती, बहती वो यादों की बस्ती…

— पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा

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