कुछ पल की यादें

कोई याद किसी को कब करता है
इन यादों को दिल में बसाकर क्यों रखता है
गर है चाहत यारों के दिल में बस जाने की
हर एक सख्स को दिल में बसाना सीखो।
दे न सको जो खुशियाँ तुम बेबस को सताना मत सीखो
भर न सको जो घावों को उनपे नमक छिडकना छोडो तुम
ये जीवन चन्द दिनों का है
कुछ पल इसकी जवानी है
सब धर्मों की है एक परिभाषा,
सबकी एक गाथा है।
न आया था साथ कोई और न कोई जायेगा
ऐ “सुबोध”तू क्यों अपने में इतराता है
एक दिन सब मिट्टी में मिल जायेंगे।
रह जाएँगी तो बस यादें “कुछ पल की यादें”….

— सुबोध कुमार पटेल

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