आ रहा आ रहा कोई फिर आ रहा

आ रहा आ रहा कोई फिर आ रहा
ऐसा लगता है दिल को मैं समझा रहा           

प्रेम की डोर में सब हैं बंधते मगर
वेदना प्रेम की कौन समझे यहाँ
देह की लालसा सब के मन में बसी
मन से मन को भला कौन समझे यहाँ
जिंदगी के सभी खेल जीतीं हो तुम
हारकर भी मगर जीतता मैं रहा
ऐसा लगता है दिल को मैं समझा रहा
आ रहा आ रहा कोई फिर आ रहा  

चित्र आँखों में औरों का रहता नहीं
बन के तस्वीर आँखों में तुम ही रहीं
पा लिया हो तुम्हे चाहें जिसने भले
इस हृदय में हमेशा हो तुम ही रहीं
पर गयीं जब से तुम हो मुझे छोड़कर
पृष्ठ जीवन के दीमक मेरे खा रहा
ऐसा लगता है दिल को मैं समझा रहा
आ रहा आ रहा कोई फिर आ रहा

रोते रोते मुझे देख तुम जा रहीं
पर नमी आँख में मेरे थी ही नहीं
कैसे होता हमारा तुम्हारा मिलन
जब लकीरें हथेली मे थीं ही नहीं
लौट आओगी तुम या चलीं जाओगी
छोड़कर भाग्य पर गीत मैं गा रहा
ऐसा लगता है दिल को मैं समझा रहा
आ रहा आ रहा कोई फिर आ रहा
 
— विशाल समर्पित

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